• By शालिनी राय 'डिम्पल'
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  • कविता
  • 04 Sep, 2026

स्त्री अब वह नहीं रही

यह कविता स्त्री की अस्मिता, आत्मसम्मान और चेतना की यात्रा को अभिव्यक्त करती है। पुरुष की वासनात्मक दृष्टि के सामने स्त्री अपने भीतर के संबल को पहचानकर स्वयं अपनी नियति की विधाता बन जाती है।

वह सम्मुख बैठा ‘पुरुष’
जो परकीय दृष्टि का स्वामी है,
जिसकी पलकें झपकती हैं तो
स्त्री की मर्यादा का आवरण
संकुचित होने लगता है।

उसकी आँखों में
कोई ‘दर्पण’ नहीं,
बल्कि एक ‘छेनी’ है,
जो देह की कोमलता को,
निर्जीव पाषाण की भाँति,
सिर्फ़ रूप और विन्यास में
नापना जानती है।

वह भूल जाता है कि
मांसल परिधियों के भीतर
एक ‘अन्तःकरण’ भी धड़कता है।

आँखों में वासना की
‘एक्स-रे’ किरणें लिए,
वह देह की परिधियों को लाँघता है।
उसकी चितवन में शालीनता नहीं,
बल्कि एक आखेटक की क्षुधा है,
जो वस्त्रों के आवरण को भेदकर
अस्तित्व की नग्नता टटोलती है।

वह भूल जाता है कि
जिस देह को वह भूगोल समझता है,
वह किसी का सम्पूर्ण ब्रह्मांड है,
वह जननी है, भगिनी है,
सुता है और संवेदना का पर्याय है।

सम्मुख बैठी वह ‘स्त्री’
अपनी आँखों में एक ‘सृष्टि’ संजोए है।
वह उसके पौरुष में ढूँढती है,
बरगद की वह शीतल छाया,
जहाँ पिता का विश्वास और
भ्राता का शौर्य
एक अभेद्य दुर्ग बनकर उसे घेर ले।

वह टटोलती है,
एक निस्वार्थ हृदय,
जो उसकी काया के ‘भूगोल’ से परे
उसकी आत्मा के ‘इतिहास’ को
पढ़ सके।

किंतु, जब संवेदनाओं के सब द्वार
वासना की अर्गला से बंद मिलते हैं,
तब उसकी चेतना का
सूर्य उदित होता है।

वह जान लेती है कि
जिस संबल की उसे प्रतीक्षा थी,
वह सामने बैठे उस ‘पिंड’ में
अनुपस्थित है।

तब कल्पना के सारे कल्पवृक्ष
यथार्थ की तप्त धूप में झुलस जाते हैं,
और उसकी छठी इंद्री,
चेतना का वह प्रखर प्रहरी,
उसे झकझोर कर सत्य से
साक्षात्कार कराता है।

वह अपनी आँखों से ‘उम्मीद’ का काजल पोंछकर,
यथार्थ की नग्न सत्यता को
स्वीकारती कर लेती है
और महसूस करती है कि
उसकी अपेक्षाओं व कल्पनाओं
से घिरा वह मानुष,
केवल एक पुरुष है…
जिसमें चेतना का अकाल है,
और वह स्त्री,
अपनी नियति की एकमात्र विधाता।

वह स्वीकारती है एक रिक्त सत्य,
जब आँखों की ‘एक्स-रे’ किरणें
थककर लौट जाती हैं रिक्त हस्त,
तब वह स्त्री जो मौन थी,
अपने भीतर एक ‘महाकाल’ जगाती है।

वह जान लेती है कि
सामने खड़ा वह ‘नर’
मात्र एक देह का कैदी है,
जिसकी चेतना की ऊँचाई
उसकी अपनी वासना की
दहलीज से ऊँची नहीं।

मौन विसर्जन

फिर होता है…
एक मौन विसर्जन..!

उन अपेक्षाओं का,
जो उसने ‘पुरुष’ से की थीं।

वह पोंछ देती है अपनी आँखों से
पिता, भाई और मित्र के वे ‘छद्म-प्रतिबिम्ब’
जो उसने एक अजनबी के चेहरे पर टाँग दिए थे।

वह समझ जाती है कि
‘संबल’ बाहर नहीं,
उसकी अपनी रीढ़ की हड्डी में
समाहित है,
जो उसे झुकने से रोकती है।

अंतिम सत्य की दीप्ति

अब वह पुरुष,
जो माप रहा था,
उसके भौगोलिक उतार-चढ़ाव,
अचानक बौना पड़ जाता है..!

क्योंकि अब स्त्री की आँखों में
‘अन्वेषण’ नहीं,
बल्कि एक ‘अग्नि’ प्रज्वलित है।
वह अग्नि, जो उसे ‘भोग्य’ से ‘भैरवी’ बना देती है।

सामने बैठा पुरुष अब भी वही है,
वही दृष्टि, वही क्षुधा,
वही संकुचित सोच…

परन्तु अब वह ‘स्त्री’
वह नहीं रही..!