• By Lalbahadur chaurasiya lal
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  • पुस्तक समीक्षा
  • 10 Sep, 2026

"बलमा_जी_का_स्टूडियो" कहानी संग्रह

डॉ. सोनी पांडेय के कहानी संग्रह ‘बलमा जी का स्टूडियो’ में ग्रामीण जीवन, सामाजिक विसंगतियों और मानवीय संवेदनाओं का यथार्थ चित्रण किया गया है। समीक्षा में इसकी भाषा, कथानक और ग्रामीण परिवेश के साथ-साथ बदलते सामाजिक मूल्यों को भी रेखांकित किया गया है।

 साहित्य शब्दों का मकड़जाल नहीं, वरन साहित्यकार की मनोवृत्ति, देश-काल, समाज, संस्कार एवं परिस्थितियों का एक विशाल दस्तावेज होता है, जिसे पढ़कर पाठक साहित्यकार की साहित्य साधना,लेखन-शैली के साथ-साथ सामाजिक विसंगतियों, कुरीतियों, प्रथाओं, रिवाज एवं मानवीय मूल्यों से परिचित होता है। साहित्यकार अपनी लेखनी के माध्यम से समाज की दशा-दिशा का यथार्थ चित्रण करते हुए उसे पटल पर लाने का महनीय कार्य करता है, जिससे संपूर्ण जनमानस रू-ब-रू होता है।

अभी हाल में मैंने ख्यातिलब्ध साहित्यकार डॉ. सोनी पांडेय द्वारा लिखा गया कहानी संग्रह "बलमा जी का स्टूडियो" पढ़ा। सन् 2018 में रश्मि प्रकाशन, लखनऊ से प्रकाशित यह कुल 10 कहानियों का एक मजबूत कहानी संग्रह है। आज स्मार्टफोन एवं इंटरनेट के सोशल मीडिया के भरे जाल में उलझा पाठक वर्ग पुस्तकों से दूर होता जा रहा है, जो दुखद है। जिसका शिकार मैं भी हूँ।

      पिछले दिनों मैं डॉ. श्यामवृक्ष मौर्य जी की तीन पुस्तकों की पांडुलिपियाँ लेकर 'स्पीच पब्लिकेशन', आजमगढ़ पहुँचा। जहाँ मेरी मुलाकात स्पीच पब्लिकेशन के मालिक श्री सत्यम प्रजापति से हुई। सत्यम जी मेरे पुराने परिचित थे। अतः काफी सम्मान मिला। वहाँ पर अनेक साहित्यिक पुस्तकों का जखीरा पड़ा था। वहीं मुझे कहानी संग्रह "बलमा जी का स्टूडियो" हाथ लगा। कुछ गुदगुदी पैदा करता शीर्षक, पुस्तक पढ़ने की अभिलाषा जगा गया। डॉ अजय गौतम को भेंट किया गया यह कहानी संग्रह सत्यम जी से मांगकर मैं घर ले आया।

     अगले दिन कहानी संग्रह का पन्ना पलटते ही मेरी मुलाकात उषा किरण खान जी द्वारा लिखी गई भूमिका से हुई। साहित्य जगत में एक बड़ा नाम उनका सुन रखा था। सो भूमिका पढ़ने की इच्छा हुई और पढ़ गया। मात्र एक पृष्ठ में समायी भूमिका पूरी 118 पृष्ठों एवं 10 कहानियों के विस्तार को समेटने में सक्षम थी। अगला पन्ना पलटा। मोटे अक्षरों में शीर्षक था "दो बातें रचनाकार की"। तभी हमारे अत्यंत प्रिय कवि मित्र श्री राकेश पांडे 'सागर' जी मेरी दुकान पर आ गए। किताब को बंद करते हुए मैंने उनका अभिवादन किया। उन्होंने पूछा, "क्या पढ़ रहे थे भाई साहब?" मैं पुस्तक को दिखाते हुए बताया, "यही एक कहानी संग्रह है - 'बलमा जी का स्टूडियो'।" वे चौंक पड़े, "अरे! यह कहानी संग्रह सोनी पांडेय द्वारा लिखा गया बड़ा ही मजेदार कहानी संग्रह है। हमने भी पढ़ा है।" आव-भगत, हाल-चाल और कुछ बातें हुईं। आधे घंटे का समय बीत गया। कवि मित्र चले गए। लेकिन एक बात दिमाग में नाच उठी - "बड़ा ही मजेदार कहानी संग्रह है"। मैं दुकानदारी में व्यस्त हो गया, लेकिन उनकी बात मेरे दिमाग में नाचती रही।

     अगले दिन अपनी स्टेशनरी की दुकान पर खाली बैठा था। एकाध ग्राहक आ रहे थे। सोचा, वह कहानी संग्रह ही पढ़ लूँ। यह क्या, दुकान से किताब ही गायब! इधर-उधर ढूंढा, कहीं पता ही नहीं चला। यहीं तो रखा था, किताब गई तो कहाँ गई? मुझे परेशान देखकर मेरे ज्येष्ठ पुत्र ने मुझसे पूछा, "क्या हुआ? क्यों इतना परेशान है? क्या ढूंढ रहे हैं?" मैंने झुंझलाते हुए, "एक कहानी की किताब थी - 'बलमा जी का स्टूडियो'। यहीं रखा था, मिल नहीं रही है।" वह मुस्कुराते हुए बोला, "अरे उसे तो हम ले गए हैं। बड़ी मजेदार कहानी है उसमें।" मेरा माथा ठनका। सभी कह रहे हैं "बड़ी मजेदार कहानी है"। आखिर क्या है इसमें? बेटे पर बाप का रौब दिखाते हुए किताब अपने कब्जे में लिया और पढ़ने में लीन हो गया। कई दिनों तक यह पुस्तक मेरी सहयात्री बनी रही। किताबें पढ़ना मेरे लिए कठिन काम है। किंतु व्यक्ति को जब किसी चीज की ललक हो जाए तो कठिनाईयां रफूचक्कर हो जाती हैं। पहली कहानी 'बलमा जी का स्टूडियो' चार दिन में खत्म हुई। दूसरी कहानी 'टूटती वर्जनाएँ' दो दिन में, तीसरी 'स्वर्ग-नरक' एक दिन में।  इसी तरह धीरे-धीरे  "अंजुमन खाला को गुस्सा क्यों आता है"  "बुद्धि शुद्धि महायज्ञ"  "जाजिम"  "कील"  "सूरमा भोपाली"  "एही ठैयां मुनरी हेरानी हो रामा" और  "मोरा साड़ी अनाड़ी ना माने राजा" अर्थात दसों कहानी पढ़कर मुझे असीम सुख मिला। कितना गहरा अनुभव एवं श्रमसाध्य रहा होगा इस कहानी संग्रह का लेखन!

        इस कहानी संग्रह की पहली कहानी में विशुद्ध ग्रामीण जीवन, अभाव एवं सीमित संसाधनों के साथ-साथ खिलखिलाता गाँव है। किशोरों व किशोरियों के मन में प्रेमांकुरण एवं उनकी मनोदशा का बड़ा ही यथार्थ वर्णन है। यह कहानी आज से लगभग 25-30 वर्ष पहले से लेकर आज तक के बदलते परिवेश से दग्ध ग्रामीण संस्कृतियों, मान्यताओं, परंपराओं, रीति-रिवाजों का एक रूपहला गुलदस्ता है, जहाँ भिन्न-भिन्न मनोभावों वाले ग्रामीण एवं उनका दृष्टिकोण नज़र आता है। लगभग सभी कहानियाँ गाँव की विशालता समेटे हुए मह-मह महक रही हैं। लेखिका डॉ सोनी पांडेय ने अपने कहानी संग्रह में गाँव को गाँव जैसा ही उतारा है। कोई बनावटीपन नहीं। कोई दिखावटी नक्काशी नहीं। यही इस कहानी संग्रह की मुख्य विशेषता है। पहली कहानी का एक अंश देखें - पृष्ठ संख्या 10 

(कोली में साइकिल के पुराने टायर को सिटकुन से मार-मार भागते नग-धड़ंग बच्चे। इनार की जगत पर गोंटी खेलती, खपर-खपर झोंटा खजुआती लड़कियाँ। कुछ कांख में भाई-भतीजे को दबाए खड़ी होकर तमाशा देखतीं..., कुछ डाली में अनाज लेकर बनिए की दुकान से तेल-मसाले की खरीद को जातीं। औरतें सुबह-शाम नियम से खेत की ओर निकलतीं निबटने और डगर में रुककर टोह-टक्कर, इनकी-उनकी लेते चलतीं। मर्द किसानी से निजात पाकर रात को चौबे जी के बरामदे में बैठ गायकी करते। कभी फगुआ, कभी चैता, कभी भजन-कीर्तन। नवयुवकों का भी अपना मंगल दल था, जो समय-समय पर नौटंकी खेलता। जब बरखा नहीं होती, शिव जी की पिंडी इनार में रस्सी से लटका कर रात भर कीर्तन होता, इस आस में कि अकबका के डूबे रहने पर शिव जी जागेंगे और इंद्र को ललकार कर बरखा कराएंगे।)

लेखिका डॉ. सोनी पांडेय ने अपनी बेबाक लेखनी से आज के बदलते ग्रामीण परिवेश का बड़ा ही मर्मस्पर्शी वर्णन किया है। कहानी पढ़ते समय पाठक को अपना गाँव, अपना बचपन, अपने मित्र, अपने खेत-खलिहान, अपना सिवान, अपनी पगडंडी, अपना बाजार सब कुछ दृश्यमान हो उठेगा तथा आज उनमें हो रहे बदलाव से आत्मसात करता उनका मन ज़रूर मसोस उठेगा। यह कहानी संग्रह ठेठ गंवई शब्दों के विशाल शब्द-भंडार का भंडारण है। स्मृतियों से ओझल हुए देशज शब्द मुस्कुरा-मुस्कुरा कर हमारा अभिनंदन करने को आतुर से लगते हैं। गाँव की सोंधी मिट्टी की चाशनी में पगे वाक्य ग्रामीण विरासत का चरम गुणगान करते प्रतीत होते हैं।

'टूटती वर्जनाएँ' कहानी में सोनी पांडेय जी ने सिर्फ एक गलत कुल-परंपरा के माध्यम से समाज में व्याप्त हज़ारों पाखंडी परंपराओं पर कुठाराघात करने का सफल प्रयास किया है। कुल की परंपरा के हवन-कुंड में स्वाहा होती एक पढ़ी-लिखी स्त्री की मन:स्थिति के माध्यम से लेखिका ने समाज को जगाने का पुनीत कार्य किया है। घर में आई नवेली वधू को एक सिवान में स्थित किसी काल्पनिक 'चमइया माई' के स्थान पर अपने पति के साथ नग्न होकर पूजन करना - एक विकृत परंपरा का निर्वहन नहीं तो क्या है? डॉ. सोनी सिर्फ कहानी नहीं बुनतीं, बल्कि दूसरे पक्ष के साथ खड़ी होकर तमाम तर्कों द्वारा विकृत परंपरा का खंडन-मंडन भी करती हैं। मातृसत्ता पर पितृसत्ता के दबदबे पर भी उनकी गहरी दृष्टि है। कहानी लिखते समय अमर्यादित शब्द भी मर्यादित, ज़रूरी और चमत्कारिक हो उठते हैं। तभी तो लेखिका लिखती हैं - पृष्ठ संख्या 41  

(एक दिन ज्योत्सना ने पूछा, "चाची जी, आप चमइया माई की पूजा करते, असहज नहीं हुई थीं?"  

"काहे की असहजता, बहिनी! देहिये न देखेगी छिनरी। कोठरी में घुसकर उसके कपार पर टांग पसरकर खड़ी हो गई। साया उठा दिया और गाने लगी... 'देखो देखो चमइया हमार सुतुही... देखो'"... और ठठाकर हंसते-हंसते लोटपोट हो गईं।)

कहानी 'स्वर्ग-नरक' में सोनी पांडेय ने ग्रामीण संपन्न व्यवसायी परिवार के माध्यम से बुजुर्गों की दशा का बड़ा ही मार्मिक चित्रण किया है, जो हमें सोचने पर मजबूर करता है। चार-चार पुत्रों व बहुओं के बाद भी परिवार की रीढ़ बुढ़िया की स्थिति के माध्यम से सोनी जी ने कहानी की जो बुनावट की है, वह बिल्कुल यथार्थ और आज की सच्चाई है। देखें पृष्ठ संख्या 48  

(अंततः पिछले तीस सालों से जिस आँगन की खूबसूरत कोठरी में विमला देवी रहती आ रही थीं, जिसे पति ने बड़े शौक से उनके लिए बनवाया था, उससे निकाल दी गईं। ऊपर की कोठरी में एक पलंग और ज़रूरत की चीजें रख दी गईं। भयंकर गर्मी में एक कूलर रख तो दिया गया, पर उसमें पानी डालने और चलाने की सुध किसी को नहीं रही।)

डॉ. सोनी पांडेय कहानी में सिर्फ समस्याओं का वर्णन नहीं करतीं, बल्कि समस्याओं का कारुणिक बोध भी कराती हैं। अंततः वही वृद्धा देख-रेख के अभाव में मर जाती है। समाज के समक्ष परिवार का बनावटीपन वर्णन करने से डॉ. सोनी नहीं चूकतीं, कह ही जाती हैं। पृष्ठ 55  

(दोपहर तक लाश उठ गई। हज़ारों की संख्या में लोग शवयात्रा में शामिल हुए। तेरहवीं के दिन दान का आलम देखने लायक था। ट्रक से महिला मंडल ने साड़ियाँ, कंबल, बर्तन, फल और राशन के पैकेट मंगाए। दिनभर गरीबों में बाँटा। मनोरमा सफेद सिल्क की साड़ी पहने एक सौ एक ब्राह्मणों के पाँव खुद पखार रही थी। सेज-दान में पूरी रसोई के उपयोग के बर्तन, एक साल का राशन, पलंग, गद्दा, रजाई, तकिया विशेष ऑर्डर देकर बनवाया गया था।)

सोनी जी को अपनी कहानी में पक्ष और विपक्ष साथ में लेकर चलने की क्षमता है। इसी कहानी में एक और परिवार है - संजय और रेखा जो कि पति-पत्नी हैं तथा संजय की माँ अर्थात रेखा की सास भी हैं। रेखा एक कुलीन पुत्रवधू एवं आदर्श पत्नी धर्म का निर्वहन बड़ी ही तन्मयता से कर रही है, जहाँ रेखा को अपनी सास में साक्षात अपनी माँ के दर्शन हो रहे थे। निश्चित रूप से यह कहानी समाज की दिशा बदलने में भावनात्मक बदलाव पैदा कर सकती है।

'अंजुमन खाला को गुस्सा क्यों नहीं आता' नामक कहानी के माध्यम से सोनी जी ने अपनी उत्कृष्ट लेखन-शैली का शानदार नमूना पेश किया है। गंगा-जमुनी तहजीब में डूबती-उतराती यह कहानी प्रेरणा से भरपूर है। वाक्यों की फुलवारी लगाना तो कोई लेखिका सोनी से सीखे। एक बानगी देखें, पृष्ठ संख्या 60  

(दिन, महीने, साल बीते। हरसिंगार खिलकर झर गए। सावन के झूले उतरे और औरतें फगुआ की फुनगी पर बैठ सपनों की सतरंगी ओढ़नी ताने फुदकती-महकती-गमकती जीने लगीं, अपने औरत होने के तमाम रंजो-गम सहेजे। गली-मोहल्ले में धीरे-धीरे रौनक लौटने लगी। रंगरेज गली फिर से गुलज़ार हो उठी।)

समाज में व्याप्त भेदभाव, जाति-पाँति एवं छुआछूत की विशाल खाई की तरफ ध्यान आकृष्ट कराते हुए लेखिका ने बड़े ही पेचीदगी से उसे पाटने का प्रयास किया है। देखें पृष्ठ संख्या 61  

(सना चने दाल का हलवा, खुरमा और चिप्स लिए चारपाई पर आकर बैठ गई। हिंदू लड़कियाँ कुछ खाने में संकोच कर रही थीं। सभी असहज थीं इस भय से कि "कैसे खाएँ, मुसलमान के घर का?" खासकर तीन पंडित और दो ठाकुर घरों की लड़कियों - पाँचों ने मना कर दिया। बची मैं और दो-तीन। सना ने न जाने क्या सोचकर बर्फी के आकार में कटा चने दाल का हलवा मेरी तरफ बढ़ाया। प्यार भरी सजल आँखें देख संकोचते, अम्मा से डरते हुए एक पीस उठा लिया और पहला टुकड़ा काटते ही तारीफ करने लगी - "सच में, हलवा हमारे घरों के बेसन के हलवे से अलग और स्वादिष्ट है।" मैं खा रही थी। धीरे-धीरे सबके हाथ बढ़ने लगे - "कि यदि ये पंडित होकर खा सकती हैं तो हम क्यों नहीं?")

कहानी 'जाजिम' इस कहानी संग्रह की प्राण है। चारदीवारी से घिरे एक घर में भाइयों का आपसी प्रेम, बहुओं का आपसी मेल-मिलाप और फिर उसमें एक विधवा का होना, वैधव्य जीवन की विभीषिका, कुछ समय बाद दरकती संबंधों की दीवारों तथा शहरी पलायन में विभाजित परिवारों का दंश झेलती एवं अकेलापन महसूस करती एक बेवा गृहिणी की मनोदशा का व्यापक एवं मर्मस्पर्शी वर्णन है। 

इस कथा संग्रह की प्रत्येक कहानी का कथानक हमें भीतर तक झकझोर कर रख देता है। सभी कहानियां ग्रामीण परिवेश के विभिन्न ताने-बाने के साथ एक नए बिंदु की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करती हैं।  कहानी का मूल तत्व सभी  कहानियों में विद्यमान है। कहानी में प्रवाह निरंतर बना हुआ है। जो सदैव जिज्ञासा उत्पन्न करता है। किंतु कहानी में कहीं-कहीं दोहराव की स्थिति है। भारी मात्रा में देशज शब्दों के प्रयोग से आजकल की युवा पीढ़ी कथा के मर्म को समझने में अकुलाहट अवश्य महसूस करेगी। हालांकि इसमें कहानीकार का कोई दोष नहीं है। कुल मिलाकर "बलमा जी का स्टूडियो" कथा संग्रह एक ऐसा सफल साहित्य पुष्प है जो निरंतर अपनी महक से साहित्य जगत को महकाता रहेगा। इस महत्वपूर्ण एवं श्रमसाध्य कृति के लिए मैं कथाकार डॉ सोनी पांडेय जी को हृदय से धन्यवाद देता हूँ। आप निरंतर साहित्य जगत में नये नये किर्तिमान गढ़ती रहें।

लालबहादुर चौरसिया लाल  साहित्यकार एवं कवि
(महामंत्री - विश्व हिंदी शोध एवं संवर्धन अकादमी आजमगढ़ इकाई)