• By Satyam Prajapati
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  • राजनीति
  • 08 Sep, 2026

क्या मनरेगा को खत्म कर सकती है सरकार?

मनरेगा की जगह नए VB-G RAM G कानून के लागू होने के बाद ग्रामीण रोजगार की गारंटी 100 से बढ़ाकर 125 दिन कर दी गई है। लेकिन सवाल है कि बढ़े हुए रोजगार के साथ क्या गांव के मजदूरों की जमीनी परेशानियां भी कम होंगी?

भारत के गांवों की अर्थव्यवस्था हमेशा से खेती और मजदूरी के बीच चलती रही है। खेत में काम मिला तो मजदूर के घर चूल्हा जला, नहीं मिला तो शहर की ओर पलायन करना पड़ा। इसी स्थिति को देखते हुए वर्ष 2005 में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी  अधिनियम यानी मनरेगा अस्तित्व में आया। इसका उद्देश्य केवल मजदूरी देना नहीं था, बल्कि ग्रामीण परिवारों को यह भरोसा देना था कि काम मांगने पर सरकार रोजगार उपलब्ध कराने के लिए जिम्मेदार होगी। समय के साथ मनरेगा ग्रामीण भारत की सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया। लेकिन अब इसका पुराना कानूनी ढांचा समाप्त हो चुका है। 1 जुलाई 2026 से विकसित भारत–गारंटी फॉर रोजगार एवं आजीविका मिशन (ग्रामीण), यानी VB-G RAM G अधिनियम लागू हो गया है। नए कानून में रोजगार की वैधानिक गारंटी 100 दिन से बढ़ाकर 125 दिन की गई है। सरकार इसे ग्रामीण रोजगार और आजीविका सुरक्षा को मजबूत करने वाला नया कदम बता रही है। लेकिन असली सवाल यह है कि कागज पर बढ़े हुए 25 दिन गांव के मजदूर की जिंदगी में वास्तव में कितने दिन जुड़ेंगे?

नए कानून की सबसे बड़ी घोषणा यही है कि अब ग्रामीण परिवार को एक वित्तीय वर्ष में 125 दिनों के रोजगार की वैधानिक गारंटी होगी। पहली नजर में यह निश्चित रूप से सकारात्मक बात दिखाई देती है। लेकिन रोजगार के अधिकार का महत्व केवल दिनों की संख्या से तय नहीं होता। सवाल यह है कि काम कब मिलेगा? कितने दिन मिलेगा? मजदूरी समय पर मिलेगी या नहीं? और क्या वह मजदूरी परिवार का खर्च चलाने के लिए पर्याप्त होगी? सरकार के अनुसार नए कानून में रोजगार न मिलने पर बेरोजगारी भत्ते और मजदूरी भुगतान में देरी पर मुआवजे जैसे प्रावधान भी मौजूद हैं। अधिकार तभी प्रभावी होता है जब उसे पाने की प्रक्रिया सरल हो और प्रशासन उसे लागू करने के लिए जवाबदेह हो। गांव का मजदूर किसी सरकारी कार्यालय के चक्कर लगाने के बजाय सीधे काम चाहता है। उसके लिए रोजगार का घर में आया हुआ पैसा होता है क्योंकि उसकी सब्जी-रोटी उसी से चलेगी। नए कानून में एक महत्वपूर्ण बदलाव केंद्र और राज्यों के बीच खर्च बांटने को लेकर है। सामान्य राज्यों में केंद्र और राज्य के बीच खर्च का अनुपात 60:40 रखा गया है, जबकि पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए यह अनुपात 90:10 है। मनरेगा की पुरानी व्यवस्था में मजदूरी का बड़ा हिस्सा केंद्र सरकार वहन करती थी। अब राज्यों को भी अधिक वित्तीय जिम्मेदारी उठानी होगी। यदि किसी राज्य की आर्थिक स्थिति कमजोर है या वह अपने हिस्से का पैसा उपलब्ध नहीं करा पाता, तो इसका असर अंततः ग्रामीण मजदूर पर पड़ सकता है।

नए कानून में एक और महत्वपूर्ण व्यवस्था है। राज्य सरकार कृषि के व्यस्त मौसम विशेषकर बुआई और कटाई के दौरान योजना के काम को एक वित्तीय वर्ष में अधिकतम 60 दिनों तक रोक सकती है। सरकार की दृष्टि से इसके पीछे तर्क समझ में आता है। यदि गांव में बुआई या कटाई का समय है तो कृषि मजदूर खेतों में उपलब्ध रहें और खेती का काम प्रभावित न हो। लेकिन ग्रामीण मजदूर की जिंदगी इतनी सीधी नहीं है। जिस मजदूर के पास अपनी जमीन नहीं है, वह खेती के मौसम में किसी किसान के खेत में काम करके मजदूरी कमाता है। वहीं बाकी समय उसके पास मनरेगा जैसा काम महत्वपूर्ण हो सकता है। इसलिए यह देखना जरूरी होगा कि काम रोकने की व्यवस्था कहीं उस समय रोजगार की कमी तो नहीं पैदा करती जब मजदूर को सार्वजनिक रोजगार की सबसे ज्यादा जरूरत हो। मनरेगा की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक उसकी मांग-आधारित प्रकृति थी। यानी ग्रामीण परिवार काम की मांग कर सकता था और सरकार की जिम्मेदारी थी कि निर्धारित अवधि में काम उपलब्ध कराया जाए। सरकार का कहना है कि VB-G RAM G में भी रोजगार की वैधानिक गारंटी और मांग-आधारित प्रकृति को बनाए रखा गया है।

लेकिन यह सिर्फ कहा जा सकता है क्योंकि भारत में गरीब आदमी के लिए किसी योजना का सबसे कठिन हिस्सा अक्सर योजना का प्रावधान नहीं, बल्कि उस तक पहुंच होती है।
जॉब कार्ड बना है या नहीं?
काम की मांग दर्ज हुई या नहीं?
मस्टर रोल में नाम है या नहीं?
मजदूरी खाते में पहुंची या नहीं?
इन छोटे-छोटे सवालों का जवाब ही तय करेगा कि नया कानून मजदूर के लिए कितना उपयोगी है।
जब मनरेगा पर बात हो रही है तो उसके अन्तर्गत पहले से काम कर रहे कर्मचारियों के वेतन और सुरक्षा की भी बात होनी जरूरी है। मैंने स्वयं कई ब्लाक में जाकर टेक्निशियन, रोजगार सेवक और अन्य कर्मचारियों से बात की तो पता चला कि मनरेगा की सभी नियुक्तियां संविदा आधार पर हैं। इनमें असिस्टेंट प्रोग्राम ऑफिसर (APO), लेखा सहायक, तकनीकी सहायक, कंप्यूटर ऑपरेटर और ग्राम रोजगार सेवक (GRS) जैसे पद शामिल हैं। दुखद बात यह है कि इन कर्मचारियों को पिछले 7-8 महीनों से वेतन नहीं मिल रहा है, जिससे उनके परिवार आर्थिक बर्बादी की कगार पर हैं। पूरे प्रदेश में हजारों कर्मचारी प्रभावित हैं। कई ने नौकरी के भरोसे लिया लोन चुकाने में असमर्थता के कारण आत्महत्या कर ली है। विभिन्न जिलों में जिलाधिकारियों को ज्ञापन दिए गए, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। होली जैसे त्योहार पर भी कोई भुगतान नहीं हुआ अब दशहरा की उम्मीद लगाए लोग काम कर रहे हैं। कर्मचारियों का EPF 2 लाख रुपये से अधिक जमा हो चुका है, जो मिलने की कोई उम्मीद नहीं दिख रही। इस प्रकार के आसार दिखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार न सिर्फ मनरेगा का नाम बदल रही है, अपितु जिस प्रकार से कर्मचारियों की सैलरी नहीं मिल रही है, कहीं इस योजना को खत्म न कर दिया जाए।

सही मायनो में भारत को विकसित बनाना है तो गांव के मजदूर को केवल लाभार्थी नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण निर्माता मानना होगा। आखिर सड़क, तालाब, खेत, घर और गांव की बुनियादी संरचना बनाने वाले हाथों को अगर रोजगार की चिंता रहेगी, तो विकसित भारत का सपना अधूरा ही रहेगा।