• By शालिनी राय 'डिम्पल'
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  • कविता
  • 01 Sep, 2026

मनुष्य बचे रहना चाहिए

‘मनुष्य बचे रहना चाहिए’ कविता आधुनिक तकनीकी जीवन में घटती मानवीय संवेदनाओं, कमजोर होते रिश्तों और बढ़ते अकेलेपन को उजागर करती है। कविता मनुष्य को प्रगति के साथ करुणा, प्रेम, दया और संवेदनशीलता को बनाए रखने का संदेश देती है।

हमने धरती पर
लोहे के जंगल उगा दिए हैं,
आकाश को तारों से नहीं,
तारों के जाल से भर दिया है..!
हमने समय को
हथेलियों में बाँध लिया है,
पर एक-दूसरे के लिए
समय निकालना भूल गए हैं..!
हमारे घर बड़े हुए हैं,
लेकिन आँगन छोटे पड़ गए हैं..!
खिड़कियाँ खुली हैं,
पर दृष्टियाँ बंद हैं..!
चेहरों पर मुस्कान का श्रृंगार है,
पर भीतर थका हुआ एकांत मन
चुपचाप बैठा है..!
हम संवाद के समुद्र में खड़े हैं,
फिर भी प्यासे हैं;
हजारों आवाज़ों से घिरे हुए,
फिर भी अनसुने हैं..!
अब दुर्घटनाएँ...
समाचार बनने से पहले
दृश्य बन जाती हैं;
और करुणा...
एक क्षणिक प्रतिक्रिया की तरह
अँगूठे के स्पर्श में सिमट जाती है..!
समय का सबसे बड़ा भय यह नहीं
कि मशीनें...
मनुष्य की भाषा सीख रही हैं,
भय यह है...
कि मनुष्य अपनी चुप्पी में
मशीन होता जा रहा है..!
धीरे-धीरे...
हमारे भीतर का जंगल सूख रहा है,
जहाँ कभी...
विश्वास की नदियाँ बहती थीं,
जहाँ संबंधों के वृक्ष पर
प्रतीक्षा के फूल खिलते थे।
अब हर व्यक्ति...
अपने ही बनाए दर्पणों में कैद है,
और स्वयं को देखते-देखते
दूसरों को देखना भूल गया है।
इस समय में,
जब प्रगति का रथ
अत्यधिक वेग से दौड़ रहा है,
सबसे बड़ा प्रतिरोध यही है
कि हम थोड़ी देर ठहरें,
किसी रोते हुए मनुष्य के पास बैठें,
किसी अपरिचित पीड़ा का हाथ थामें,
और बिना किसी लाभ के
किसी के लिए उपस्थित रहें।
सभ्यताएँ,
अपनी ऊँचाइयों से नहीं,
अपनी करुणा से महान होती हैं।
एक दिन...
हमारी इमारतें धूल हो जाएँगी,
हमारी तकनीक पुरानी पड़ जाएगी,
हमारी उपलब्धियाँ...
इतिहास के पन्नों में सो जाएँगी;
पर यदि उस दिन भी
मनुष्य के भीतर
थोड़ी-सी दया,
थोड़ी-सी लज्जा,
थोड़ी-सी संवेदना,
और थोड़ा-सा प्रेम बचा रहा,
तो समझना...
पृथ्वी पर मनुष्य
अभी पराजित नहीं हुआ है।
और आने वाले समय की
सबसे बड़ी क्रांति यही होगी...
कि मनुष्य फिर से
मनुष्य बने रहने का निर्णय करेगा।
 

कवयित्री: शालिनी राय ‘डिम्पल’
आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश