• By Priyanka Yadav
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  • पुस्तक समीक्षा
  • 04 Sep, 2026

इंसानियत, अदब और प्यार को बचाए रखने की एक कोशिश हैं हसीन खान की कविताएँ

‘ज़मीन पर उतरी कविता’ एम. हसीन खान का ऐसा काव्य-संग्रह है, जिसमें प्रेम, इंसानियत, स्त्री-जीवन, सामाजिक सरोकार और राजनीतिक विडंबनाओं की गहरी अभिव्यक्ति दिखाई देती है। यह संग्रह बदलते समय में मनुष्यता, रिश्तों और संवेदनाओं को बचाए रखने की एक सार्थक कोशिश है।

‘ज़मीन पर उतरी कविता’ : काव्य-संग्रह की एक साहित्यिक समीक्षा

एम. हसीन खान एक चर्चित युवा रचनाकार हैं। ‘ज़मीन पर उतरी कविता’ नामक काव्य पुस्तक उनका दूसरा काव्य संग्रह है। ‘तुम युवा हो’ उनका पहला काव्य संग्रह है। वे इन दिनों निरंतर अपने रचनाकर्म से जुड़े हैं। ‘समकालीन काव्य परिदृश्य और नागार्जुन का काव्य’ जैसी महत्वपूर्ण उनकी कई पुस्तकें प्रकाशित हैं। एम. हसीन खान जी को देश के कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाज़ा गया है।

उनके लेखन का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है। जिस प्रकार स्वस्थ रहने के लिए नींद आवश्यक है, ठीक उसी प्रकार स्वस्थ मन को जागरूक और प्रतिबद्ध बनाने के लिए कविता। साहित्यिक विधाओं में कविता सबसे प्रभावी रही है। ऐसे में कविता मानव और मानवीय जीवन को ज्यादा प्रभावित करती है। अपने समय और परिस्थितियों को खोजने, समझने और बचाए रखने का सादर भाव भी कविता का लक्ष्य है।

‘ज़मीन पर उतरी कविता’ प्रो. एम. हसीन खान की सद्य-प्रकाशित कृति है। यह पुस्तक लगभग 172 पृष्ठों की है। इन कविताओं में सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था पर आधारित कई आख्यान हैं। इस प्रकाशन से उनकी साहित्यिक सक्रियता का पता चलता है। साथ ही इनकी कविताओं से कवि के स्वभाव और विचार का पता चलता है। समाज के प्रति एक रचनाकार की क्या सोच-समझ होती है और उनका सैद्धांतिक नज़रिया कैसा है, इससे भी यह काव्य पुस्तक हमें रूबरू कराती है।

विषय-विविधता और सामाजिक सरोकार

यह संग्रह हिन्दी और उर्दू शब्दों की बाहुल्यता के साथ-साथ नए शब्द-विन्यास को लिए है, जो सरल शब्दों के साथ सहज भी बन पड़ा है। इस संग्रह की विशेषता इसकी ‘विषय-विविधता’ है, जो सामाजिक व्यवस्था के साथ राजनीतिक व्यवस्था के खोखलेपन को बेनक़ाब करती है।

भारतीय एवं पाश्चात्य सभ्यताओं के बीच सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन की त्रासदी को कवि-मन बड़े करीब से देखता है। तभी वह फ़िलिस्तीन की एक घटना का ज़िक्र करते हुए एक माँ की त्रासदी को रच पाता है। एक जगह कवि कहता है—

“रिक्तताबोध से भरी हुई मां हूं मैं
 भले ही नियति के निकट तनकर कविता लिख लूं
 आंसुओं के सागर में डूब कर नित पार भी होती रहूं
 मगर अपने शिशु को स्तनपान कराने के लिए
 आज भी मैं तरस रही हूं।”

प्रस्तुत कविता में यह दर्शाया गया है कि युद्ध की विभीषिका की चपेट में सिर्फ आम आदमी ही आता है। यही कारण है कि परिवार विघटित हो रहा है। एक स्त्री है, जो नियति के इस खेल से गुजरते हुए अपनी पीड़ा को कैसे झेलती है! कितना हृदय विदारक होता है एक स्त्री के लिए अपने बच्चे को गर्भ में ही खो देना और उसकी रिक्तता में जीना। यह बहुत मार्मिक स्थिति है। इस तरह की कई कविताएँ हैं, जो मानवीय स्तर पर हमें झकझोर कर रख देती हैं।

साधारण से असाधारण की ओर जाती कविता

इस पुस्तक की एक बहुत बड़ी खासियत यह है कि कविता की पंक्तियाँ जहाँ से शुरू होती हैं, वह सामान्य लगती हैं; पर जैसे-जैसे कविता की पंक्तियाँ अपने फलक की ओर जाती हैं, वह अपने आप में महत्त्वपूर्ण बन जाती हैं। इस संदर्भ में एक कविता है—

“धान रोपने के गीत गाकर
 वे अनजाने में
 बो देती हैं मिट्टी में
 पसीने से डूबी एक ऐसी प्राकृतिक गंध
 जहाँ तर-बतर होकर
 हरी-भरी धरती
 उगलने लगती है
 हमारी भूख मिटाने को बेहिसाब अन्न।”

इन पंक्तियों की शुरुआत में देखें तो गाँव की स्त्रियों का ज़िक्र है, उनके द्वारा धान रोपने के गीत का दृश्य है। अब जैसे-जैसे हम पंक्तियों को पढ़ते हैं, अलग-अलग बिंब बनते जा रहे हैं। जैसे—‘बो देती हैं मिट्टी में, पसीने से डूबी एक ऐसी प्राकृतिक गंध’। यह जो बिंब है, वह बहुत कलात्मक बन गया है।

कवि ने स्त्री के पसीने की गंध और मिट्टी की गंध को बड़े सुंदर ढंग से रचा है। फिर कवि ने इसी गंध से धरती के हरे-भरे होने की बात कही है और भूख मिटाने की बात कही है। इस तरह कविता अपने आख़िरी पड़ाव में आते-आते और जीवंत हो उठती है।

स्त्री के बहुआयामी व्यक्तित्व का चित्रण

एक महत्वपूर्ण कविता है ‘स्त्रियाँ कुछ भी नहीं भूलती हैं’, जो स्रोतस्विनी सलिल की मानिंद प्रवाहमयी है, जिसमें स्त्रियों के बहुआयामी व्यक्तित्व को चित्रित किया गया है। स्त्रियों के बिना घर महत्वहीन है। उनमें सजाने-संवारने की कला प्रकृति प्रदत्त है, यथा—

“स्त्रियां जनम से
 बहुआयामी होती हैं…
 क्योंकि सहेजने और संभालने की कला
 प्रकृति से उन्हें पहली सांस से मिली होती है।”

स्त्री के बिना दुनिया की कल्पना नहीं की जा सकती है। स्त्री संसार की सुंदर सृष्टि है, जो स्वयं की आहुति देकर इस जहाँ को सुंदरतम बनाती है। इन सभी चित्रों को कवि ने बड़े मनोयोग के साथ अंकित किया है।

यथा—

“वे भूलने के देवता अपस्मार की
 सबसे सुंदर कृति है
 जो सब कुछ भूलाकर
 स्वयं को मिटाकर
 हमारे संसार को सुंदर बनाती है।”

जाहिर है कि स्त्री जीवन की महत्ता को चित्रित करती यह एक बेहतरीन कविता है, जो पढ़ने के पश्चात मानसिक पटल पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ती है।

बेटियाँ : दो परिवारों को रोशन करने वाली रोशनी

बेटियाँ ईश्वर के द्वारा मानव समाज के लिए वो अनमोल उपहार हैं, जो एक नहीं बल्कि दो परिवारों को रोशन करती हैं। बेटियाँ धान की उस फसल के समान हैं, जिसकी पौध तो कहीं और उगाई जाती है और उस पौध की रोपाई कहीं और की जाती है।

हमारे गाँव में बेटियों को पढ़ाना आज भी एक ऐब समझा जाता है। हालाँकि पहले के मुकाबले हालात कुछ बेहतर हुए हैं, लेकिन इतने बेहतर नहीं हुए हैं कि इस पर बहुत खुश हुआ जाए। आज भी पढ़ने वाली लड़कियों के माँ-बाप को बहुत कुछ सुनना पड़ता है।

कवि एम. हसीन ने अपनी कविता ‘स्कूल जाती लड़कियाँ’ में बहुत ही गहरी बात की है। सही मायने में देखा जाए तो इससे सुंदर दृश्य कोई दूसरा हो भी नहीं सकता—

“बस्ते के बोझ से
 दबे होने के बावजूद भी
 हंसती रहती हैं लड़कियां,
 बिना भेद किए बोझ उठाने में
 सबसे आगे रहती हैं ये लड़कियां
 घर का, बाहर का
 तन का, मन का और सबका।
 देखने में छुई-मुई की तरह होती हैं
 किन्तु भीतर से मजबूत होती हैं लड़कियां।”

पिता और बेटी का प्रेम

एक पिता का अपनी बेटी के प्रति प्यार एक ऐसा बंधन है, जो सामान्य से परे है। यह एक ऐसी शक्ति है, जो उसे जीवन भर पोषित, निर्देशित और सशक्त बनाती है। उसकी शुरुआती यादों से लेकर उसके वयस्क वर्षों तक, एक पिता का प्यार निरंतर बना रहता है, जो अटूट समर्थन और अलिखित वादे प्रदान करता है।

एक बेटी का अपने पिता के प्रति प्रेम ऐसा प्रेम है, जो न दूरी जानता है, न समय। एक पिता का प्यार एक राग है, जो उसकी बेटी के दिल में बस जाता है। बेटियाँ पिता के लिए गर्व और खुशी का सबसे बड़ा स्रोत होती हैं। एक पिता का प्यार सबसे कीमती उपहार है, जो वह अपनी बेटी को दे सकता है—

“एक बेटी के लिए
 उसके पिता का वजूद
 किसी आकाश से कम नहीं,
 जो उसे शीत से, ताप से,
 संताप से बचाता है,
 उसे हौसले का पंख देकर
 पूरी दुनिया में उड़ने को कहता है,
 तभी तो दुनिया भर की बेटियां
 उड़ने लगती हैं तितलियों की तरह
 चहचहाने लगती हैं चिड़ियों की तरह
 गुनगुनाने लगती हैं झरने की तरह।”
 
“एक पिता की गरीबी को
 कैसे अमीरी में बदल देती है बेटियां,
 यह मैंने आज
 इस इश्तिहार से जाना है।”

प्रेम : संग्रह की केंद्रीय संवेदना

‘ज़मीन पर उतरी कविता’ एक ऐसा काव्य संग्रह है, जिसे धीरे-धीरे अंतर्मन की यात्रा के साथ धैर्य के चूल्हे पर सालों तक पकाया गया है। ये केवल शब्दों की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि जीवन के एक पूरे पड़ाव की अभिव्यक्ति है।

स्त्री-मन की अनेक परतों को क़दम-दर-क़दम खोलती हुई ये कविताएँ कभी पकड़ लेती हैं पिता की उंगली, तो कभी माँ बनकर उठा लेती हैं सारा दायित्व अपने कंधों पर। ‘ज़मीन पर उतरी कविता’ की स्त्रियाँ मार सकती हैं प्रेम का झन्नाटेदार तमाचा नफ़रत के मुँह पर और जीवन में सरपट भाग सकती हैं बिना किसी प्रेमी के, केवल अपने साथ लेकर अपनी कलम और किताब।

उन्हें नहीं चाहिए दुनिया की मुहर ख़ुद पर, जिन्हें भरोसा है हर पल धूप से टपकते हुए ईश्वर पर। ये कविताएँ केवल शब्दों की बुनावट नहीं, ये कवि की आत्मा की अन्तर्ध्वनियाँ हैं, जो ध्यान के साथ टकराती हैं और शब्दों में उतर आती हैं।

एक अच्छा जीवन वास्तव में प्रेम से प्रेरित और ज्ञान द्वारा निर्देशित होता है। प्रेम जुनून, उद्देश्य और जुड़ाव प्रदान करता है, जो हमारे जीवन को अर्थ और जीवन शक्ति से भर देता है। इस बीच ज्ञान हमें सूचित निर्णय लेने, चुनौतियों का सामना करने और दुनिया में सकारात्मक योगदान देने की शक्ति देता है।

प्रेम इस संसार का शायद वो सबसे पुरातन भाव है, जो किसी कवि के मन को अंकुरित कर पाने में संभव हुआ है। प्रेम जन्म से लेकर अंत तक मनुष्य के जीवन में न जाने कितने रूपों में आता है और चला भी जाता है। केवल जो टिक जाता है, वो है उससे जुड़ी हुई स्मृतियाँ।

इन्हीं स्मृतियों की पोटली से कुछ शीशे बटोरकर कवि ने जिस प्रेम को देखा और पाया, उसे इस कविता संग्रह में प्रस्तुत किया है। प्रेम में कविताओं का होना और कविताओं में प्रेम का होना लगभग वैसा ही है, जैसे पानी में ऑक्सीजन का होना। दोनों में से किसी की कमी हो जाए तो जीवन और मृत्यु के बीच की दूरी कम होने लगती है।

इस संग्रह में भी कवि प्रेम की अंगुलियाँ थामे उस यात्रा का अनुभव कराता है, जो उनके भीतर अंतर्मन में चल रही है। परंतु कवि के यहाँ भीतर के अलावा बाहर का भी संसार है। वहाँ किस तरह से प्रेम की अनुपस्थिति है, वह अनुपम है।

कविताओं में डर और उन डरों से उपजी ढेरों चिंताएँ हैं। इन सबको प्रेम के आईने से देखते हुए कवि ने विविध रंगों का संस्पर्श किया है। इन संस्पर्शों को इस काव्य संग्रह में रचनाकार ने भर दिया है।

जो कविताएँ शामिल की गई हैं, उनमें से अधिकतर कविताएँ प्रेम से जुड़ी हैं। कवि ने एक प्रकार से ‘प्रेम है, था और कहीं भी और कभी भी हो सकता है’ की बात कहते हुए बीच में संबंधों का एक पुल बना दिया है।

कई कविताएँ प्रेम जीवन को उधेड़ती हुई-सी लगती हैं। इसके धागों के खुलने पर अंदर का संसार, आशंकाओं के साथ-साथ इंतज़ार को भी दर्ज करता है; साथ ही न लौट आने की पीड़ा को भी। कुछ कविताएँ पाठकों को बहुत गहरे तक असर करती हैं, जैसे—‘प्रेम का व्याकरण’, ‘एक मुट्ठी प्यार’, ‘बात करती आँखें’, ‘बाँट जाते प्रेम पृथ्वी पर’, ‘प्रेम के आदिम बीज’, ‘प्रेम के हरे रंग में’, ‘जहाँ से दुनिया भर का प्रेम गुज़रा है’ आदि।

प्रेम का अपना एक व्याकरण

जीवन के ऊबड़-खाबड़ पथ का अंतिम किनारा प्रेम है। प्रेम परमात्मा को महसूस करने की उच्चतम शिखर है। प्रेम को शब्दों में समझना मुश्किल है। प्रेम की कोई परिभाषा नहीं होती। परिभाषा तो वस्तु या पदार्थ की होती है।

जिस प्रकार माँ के हृदय के वात्सल्य को समझाया नहीं जा सकता, पति-पत्नी की दांपत्य मैत्री को समझाया नहीं जा सकता, उसी तरह प्रेम को समझाया नहीं जा सकता है। इसलिए यह अनुभव और बोध का विषय है।

प्रेम के इसी अलौकिक रूप को दर्शाती है एक कविता—

“पहली नजर का
 पहला प्यार
 अकस्मात हो जाता है
 बिना कुछ जाने समझे,
 उसमें समझने के लिए भी
 शायद कुछ नहीं होता
 सिवाय आंखों के।.....”
 
 “प्रेम का यह अदेहपन
 शरीर से जुदा होता है,
 वहां शरीर नहीं केवल दिखती हैं आंखें
 जो दिन रात प्रेम में चमकती-डबडबाती हुई
 प्रतीक्षा करती हैं।
 यह प्रतीक्षा अपने उसी पथ पर मूक होकर जारी रहती है,
 जहां से बिछड़ गया था प्यार
 सदा-सदा के लिए।”

“प्रेम का अपना एक व्याकरण होता है
 जिसमें क्रिया, खुद-ब-खुद
 संज्ञा सर्वनाम के धागे से
 विशेषणों की एक ऐसी दुनिया बनाती है,
 जहां मामूली से लगने वाले अक्षरों का भी
 अर्थ असाधारण हो जाता है।”

राजनीतिक व्यवस्था और प्रतिरोध का स्वर

एक ओर जहाँ पूरा देश अंधभक्ति में लीन है, अपनी धरोहरों को बचाने या उसका सच्चा प्रसार करने के बजाय उसके प्रति अंधश्रद्धा रखकर अंधविश्वासी बना हुआ है। और इसे ही विकास का नाम दे रहा है। फिर वहाँ से वह स्वयं विस्थापन का शिकार होता जा रहा है।

ऐसे माहौल में कवि एम. हसीन खान की पैनी नज़र हर उस स्थान पर है, जहाँ से मनुष्य को ठेस लगनी शुरू होती है।

हिंदी की जातीय अस्मिता और हिंदी कविता एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ उसे रोज संघर्ष से दो-चार होना पड़ रहा है। बेरोजगारी और विस्थापन की पीड़ा झेल रही युवा पीढ़ी भी संघर्ष से आँखें नहीं चुरा रही है, अपितु उससे सौ फीसदी लड़ती हुई दिख रही है तथा सत्ता के शीर्ष पर बैठे अलंबरदारों से सवाल भी पूछ रही है।

‘वीर से अग्निवीर बना दिया’, ‘देश तुमसे पहले भी था’ और ‘बुलडोज़र’ आदि कविताएँ इस ओर इशारा करती हैं—

“हम सभी जानते हैं
 तुम शब्द और नारे गढ़ने में माहिर हो
 अग्नि से जनमने
 और मरने का वरदान देकर
 तुमने कितनी चतुराई से
 हमें वीर से अग्निवीर बना दिया।”

कवि हसीन खान ने अपनी कविता तथा विचारों के माध्यम से प्रतिरोध का एक ऐसा नया मुहावरा गढ़ा है, जिसे इनके काव्य चिंतन से उभरी कविताओं में आसानी से देखा जा सकता है।

इस संदर्भ में ‘चुनावों के देवता’, ‘जहाँ सच लापता है’, ‘मैं भगवान बन जाऊँ’, ‘सुन रहे हो न सुकरात’ आदि कविताएँ उल्लेखनीय हैं।

इन कविताओं को पढ़ते समय हर उस दृश्य की छाया मस्तिष्क से होकर गुजरने लगती है, जिसे कवि ने आज के विडंबना और अभावग्रस्त संकट के समय में लिखा है।

“स्वर्ग में एक विचार सभा चल रही है
 कोई कुछ तो कोई कुछ बातें कर रहा है,
 हर ओर बस एक ही कानाफूसी हो रही है
 भारत में एक नये देवता
 चुनावों के देवता का अवतरण हो गया है।”
 
“जनता तो बहुत खुश है कि
 चुनाव के इस देवता में
 सारे देवता के गुण एक साथ मिल जा रहे हैं।
 अब हम सभी को भटकना नहीं पड़ेगा
 मंदिर-मंदिर
 सजाना नहीं पड़ेगा अलग-अलग पूजा की थाली
 खुश करने के लिए इस देवता को
 जोर-जोर से बजानी पड़ती है बस एक ताली।”

यहाँ कवि कितना बेखौफ होकर आज की व्यवस्था का विरोध करते हुए लोक की चिंता के प्रति व्याकुल और बेचैन है, यह दर्शनीय है। समय कितना बलवान है, इस पर कवि का व्यंग्य बहुत ही सहज दिखाई पड़ता है।

लोकतांत्रिक राज्यों, राष्ट्रों में सत्ता की बागडोर जनता के हाथ में होती है और जनता अच्छे और गतिशील समाज के निर्माण के लिए उत्तरदायी और जिम्मेदार होती है। वह भी नींद में है तो दूसरी ओर उसके चुने गए नुमाइंदे भी नींद में हैं।

कवि की अकुलाहट और बेचैनी उसे इस व्यवस्था के खिलाफ नींद से जगने के लिए विवश करती है। कवि ने अपने संघर्ष, अपने लोक से उपजी ज़मीन को न सिर्फ बनाए रखा है, बल्कि वह लगातार बेहद सक्रियता के साथ उसे आगे ले जाने के लिए तत्पर भी है।

चिट्ठियों की स्मृति और बदलता समय

आज के इस दौर में जहाँ सब कुछ डिजिटल हो गया है, कागज़ की जगह स्क्रीन ने ले ली है। क़लम की जगह की-बोर्ड ने ले ली और पोस्टमैन की जगह इंटरनेट ने।

चिट्ठियाँ कहाँ खो गईं, जिनमें लिखने के सलीके छुपे होते थे। कुशलता की कामना से शुरू होता था ख़त, बड़ों के चरणस्पर्श पर ख़त्म होता। कितना कुछ सिमट जाता था एक नीले से कागज़ में, जिसे नवयौवना भागकर सीने से लगाती और अकेले में आँखों से आँसू बहाती।

माँ की आस और पिता का संबल होती थीं चिट्ठियाँ। बच्चों का भविष्य और गाँव का गौरव थीं ये चिट्ठियाँ। यह चिट्ठी हम सबकी ज़िंदगी में कभी गाहे-बगाहे आ जाया करती थी। किन्तु अब मोबाइल के ज़माने में इन चिट्ठियों का अस्तित्व ही गुम-सा हो चला है।

इस संदर्भ में यह कविता उल्लेखनीय है—

“ये चिट्ठियां
 खबर देती हैं होने की,
 एहसास दिलाती हैं
 दूर की, पास की
 युद्ध के मैदान की,
 जहां चिट्ठियों के शब्द स्याही से नहीं
 रक्त से लिखे होते हैं
 जिनसे गंध आती है बारूद की,
 किन्तु प्रेमिकाओं के हाथों में आते ही
 ये चिट्ठियां भर जाती हैं अपनेपन से,”

समय के साथ-साथ चीज़ें आसान तो हो गई हैं, पर बढ़ती जा रही है भावशून्यता। इस कविता के माध्यम से कवि ने बदलती स्थितियों के प्रति गहरी चिंता व्यक्त की है।

स्त्री, प्रकृति और संवेदना

प्रकृति और धरती को स्त्री का पूरक कहा जाता है। अनेक उपमाओं से शोभित की गई है स्त्री। प्रकृति और स्त्री दोनों समानधर्मा हैं—ऐसा ही एक रूपक ‘एक स्त्री का प्राकृतिक बोध’ कविता में प्रस्तुत है—

“आज भी हम गाहे-बगाहे
 स्त्रियों की उन सच्ची बातों को
 अनसुना कर जाते हैं
 जिनमें छिपा होता है
 ममता और प्रेम का अगाध सागर।”
 
“आज विज्ञापनों में
 भले दाग अच्छे हो गए हों
 किन्तु हमारे देश में
 कभी भी दाग अच्छे नहीं रहे
 बात जब स्त्रियों के
 शोषण और अपमान की हो तो बिल्कुल भी नहीं।”

कविता के दर्पण में समाज

हसीन जी की एक कविता है ‘कविता के दर्पण में’, जो इस संग्रह की पहली कविता भी है। आज के इस संकट के समय में अपनी विवशता के बीच समाज का दर्पण बन खड़ा होना और उससे टकराना बेहद जरूरी हो गया है, क्योंकि बिना दर्पण बने समाज के दायित्व से मुक्त हो पाना असम्भव प्रतीत होता है।

कवि जिस दर्पण में झाँकने का प्रयत्न कर रहा है, उसमें उसके हृदय-स्पंदित व संकुचित मन की पीड़ा का भान हो रहा है। घर की चारदीवारी के बीच जिस भाव की कचोटता को कवि रचता है, वह कवि के हृदय में नासूर की तरह चुभन पैदा कर रही है। हृदय में कसक उत्पन्न कर रही है, जो बेहद मार्मिक है—

“दूसरों के दुःखों को यह दर्पण
 पानी की तरह साफ दिखाता है
 जहां झिलमिल करती हुई सारी कायाएं
 स्वर-व्यंजन की तरह आपस में लिपटी रहती हैं
 अपने-अपने समर्पण के साथ
 कविता की उस भूमि पर
 जहां संवेदनाओं के हरे-भरे पेड़
 युगों-युगों से
 हम सभी के जंगल में लहलहाते आयें हैं।”
 
“आज जरूरत है हमें भी
 एक मुकम्मल आदमी बनने की,
 जैसे अलग-अलग होकर भी हम
 कविता के दर्पण में
 एक मुकम्मल आदमी बने रहते हैं।”

कोविड, लॉकडाउन और उदासी का समय

कवि एम. हसीन खान ने कोविड के दौरान महत्वपूर्ण कविताएँ लिखी हैं। कोविड और लॉकडाउन ने हमारे जनजीवन और मनोदशा को गहरे स्तर तक प्रभावित किया। इस दौरान खूब कविताएँ-कहानियाँ लिखी गईं।

हसीन खान जी की ‘उदास है’ और ‘जब कोई अच्छा आदमी मरे’ नामक कविताएँ कोविड के दौर की हैं। इन कविताओं में वैश्विक त्रासदी के समय की घुटन और संत्रास को बड़ी संवेदनापूर्वक अभिव्यक्ति दी गई है।

“कभी रेल की पटरियों को आराम नहीं था
 लेकिन आज थम गयी हैं-
 न कभी रुकने वाली रेलें
 और उस पर सवार जिंदगियाँ
 लॉकडाउन के इस कोरोना काल में।
 आज! अनगिनत नगरों को
 आबाद करती ये जिंदगियाँ
 और रेल की पटरियाँ दोनों उदास हैं।। ”

यहाँ रेल की पटरियों का दृश्य काव्य प्रयोग के स्तर पर अनुपम है। कवि ने नए बिंबों और प्रतीकों का उपयुक्त प्रयोग कविताओं में स्वाभाविक तौर पर किया है।

रिश्तों को बचाने की पुकार

जिस प्रकार आधुनिकता की चकमकाहट ने हमारे समाज को प्रभावित किया है, ठीक वैसे ही वह हमारे दिलों-दिमाग को भी अकेलेपन के रास्ते से भटका चुकी है। जिसका प्रभाव हमारे व्यवहार और रिश्तों पर भी पड़ा है।

हम सभी जगह सिर्फ और सिर्फ अपने स्वार्थ के कारण जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि कवि हसीन खान रिश्तों को बचाने की बात करते हैं।

यथा—

“दुनिया में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं
 जो सिर्फ आपकी उपस्थिति में ही आपके होते हैं।
 वे, किसके होते हैं ठीक से उनको भी नहीं मालूम
 वे अपने जीवन को भी ठीक से नहीं जानते,
 कितनी कीमती होती है हमारी साँस
 कितनी शाश्वत होती है
 भूख और प्यास कितनी पीड़ा से गुजरता है
 हमारा श्रमरत समाज।”

मृत्यु : जीवन का शाश्वत सत्य

इस संग्रह में एम. हसीन खान ने मृत्यु जैसे शाश्वत सत्य पर कई कविताएँ बेजोड़ लिखी हैं। उनकी मृत्यु पर केंद्रित कविता ‘मिट्टी से बनी हुई यह दुनिया’ एक बेहद मार्मिक कविता है, जिसे पढ़ने पर रोम-रोम करुणा के सागर में डूब जाता है।

कवि ने अपने भैया प्रो. शमीम की याद में यह कविता लिखी है। मनुष्य की मृत्यु के बाद समाज जब शोक मनाता है, तो उस समय की मनोस्थितियों से गुजरना कितना पीड़ादायक होता है। शोक की स्थिति मनुष्य के जीवन में बहुत दुखद होती है।

मनुष्य को अपने जीवन पर अहंकार नहीं करना चाहिए। जो भी अर्जित है, वह परिवर्तनशील है। हम सभी मिट्टी से बने हैं और एक दिन मिट्टी में मिल जाएंगे।

कविता की ये पंक्तियाँ उल्लेखनीय हैं—

“आज मिट्टी
 हम सभी से रूठकर
 फिर मिट्टी में मिल गई
 छोड़ गई अपना ढेर सारा अमिट निशान”
 
“मिट्टी से बनी हुई यह दुनिया
 एक दिन मिट्टी में मिल जाएगी,
 सारी मिट्टियाँ इसी तरह एक साथ रोएंगी
 एक साथ मुस्कुराएंगी
 और सभी बारी-बारी से
 मिट्टी में मिलते हुए
 एक दूसरे को देखते रहेंगी।”
 
“वे इसी तरह समय-समय पर
 एक घर से निकलकर
 अपने दूसरे घर
 मिट्टी के पास जाती रहेंगी।। ”

इसी भाव की एक और कविता है ‘एक और विकेट गिरा’। कविता की पंक्तियाँ देखें—

“यहां लोग
 जाने के लिए ही आते हैं
 लोग जाएंगे नहीं तो आएंगे कैसे
 विश्व कप में, मैच खेलते हुए
 आज हमारी टीम का एक और विकेट गिरा
 दुनिया में भी लोग इसी तरह
 पहले आते हैं, फिर चले जाते हैं
 चौके छक्के लगाकर।”

दुनिया को साधारण तरीके से परिभाषित करते हुए कवि ने जिस असाधारणता का परिचय दिया है, वह बेजोड़ है!

निष्कर्ष

अतः हम कह सकते हैं कि ‘ज़मीन पर उतरी कविता’ काव्य संग्रह हमारे सामान्य जीवन में आए बदलाव से हमें रूबरू कराता है, तो दूसरी तरफ हम जीवन से पल-पल कैसे दूर होते जा रहे हैं, उसकी भी पड़ताल करता है।

प्रत्येक मनुष्य के जीवन में रिश्तों की अहमियत बहुत महत्वपूर्ण है, जिसको हम सभी ने महामारी के समय में नज़दीक से महसूस किया है और कर भी रहे हैं। कवि एम. हसीन खान जी ने इन सबकी बखूबी पड़ताल की है। कवि ने रिश्तों को जोड़ने का अनुग्रह भी शानदार ढंग से किया है।

साथ ही इन्होंने अपनी कविताओं में जीवन को बचाए रखने और जीने की लालसा को बड़ी मार्मिकता के साथ उद्घाटित किया है।

कुल मिलाकर, ‘ज़मीन पर उतरी कविता’ काव्य संग्रह मनुष्यता और प्रेम को बचाने के संघर्ष पर बुनी एक ऐसी झीनी-बीनी चदरिया है, जो कबीर की ललकार से चलकर निराला के मुक्त छंद तक की एक यात्रा है, जो नागार्जुन के उस कोकिल की याद हमें बरबस दिला देती है, जो शासन की बन्दूक से भी नहीं डरती है।

इधर मनुष्य और मनुष्यता के बीच समाज में जो अंतर और खाई मौजूदा समय में बढ़ी है, उस खाई को पाटने और कहीं कुछ जो रोज़ हममें टूट रहा है, उसको जोड़ने का काम भी इस संग्रह की कविताएँ अवश्य करेंगी।


 पुस्तक विवरण

 कविता संग्रह: ज़मीन पर उतरी कविता
 कवि: एम. हसीन खान
 प्रकाशक: न्यू वर्ल्ड पब्लिकेशन