• By Divyashakti Kumar Gautam
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  • 02 Sep, 2026

सोशल मीडिया का युवा पीढ़ी पर प्रभाव

सोशल मीडिया युवाओं के लिए शिक्षा, रोजगार, प्रतिभा और सामाजिक जागरूकता के नए अवसर लेकर आया है। लेकिन इसके अत्यधिक उपयोग से समय की बर्बादी, गलत सूचना, मानसिक दबाव और साइबर अपराध जैसी चुनौतियाँ भी बढ़ रही हैं।

21वीं सदी को यदि सूचना, तकनीक और संचार की सदी कहा जाए तो यह बिल्कुल गलत नहीं होगा। इंटरनेट और स्मार्टफोन ने मनुष्य के जीवन को जिस प्रकार से बदला है, उसका सबसे स्पष्ट उदाहरण सोशल मीडिया के विस्तार में दिखाई देता है। आज सोशल मीडिया केवल मनोरंजन या दोस्तों से बातचीत करने का माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह शिक्षा, रोजगार, व्यापार, राजनीति, सामाजिक जागरूकता, समाचार, जनमत निर्माण और व्यक्तिगत अभिव्यक्ति का महत्वपूर्ण साधन बन चुका है। विशेष रूप से युवा पीढ़ी सोशल मीडिया के प्रभाव में सबसे अधिक दिखाई देती है।  कुछ दशक पहले किसी व्यक्ति के विचार या प्रतिभा को बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचाने के लिए समाचार-पत्र, टेलीविजन, रेडियो या किसी बड़े मंच की आवश्यकता होती थी। आज एक स्मार्टफोन और इंटरनेट कनेक्शन के माध्यम से कोई युवा कुछ ही क्षण में अपना विचार, वीडियो, लेख, कला या ज्ञान हजारों-लाखों लोगों तक पहुँचा सकता है। इस परिवर्तन ने युवाओं के लिए अवसरों के अनेक नए द्वार खोले हैं। लेकिन दूसरी ओर सोशल मीडिया का अत्यधिक और अनियंत्रित उपयोग चिंता का विषय भी बन रहा है।

भारत में डिजिटल विस्तार की स्थिति इस परिवर्तन को स्पष्ट रूप से दिखाती है। 

Data Reportal की 2025 रिपोर्ट के अनुसार, जनवरी 2025 में भारत में करीब 80.6 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता और 49.1 करोड़ सोशल मीडिया यूज़र आइडेंटिटीज थीं। इंटरनेट की पहुंच 55.3% और सोशल मीडिया की पहुंच 33.7% आबादी तक थी। जनवरी 2024 से जनवरी 2025 के बीच सोशल मीडिया यूज़र आइडेंटिटीज में लगभग 2.9 करोड़ की वृद्धि हुई।  यहाँ यह समझना आवश्यक है कि सोशल मीडिया यूज़र आइडेंटिटीज को हमेशा अलग-अलग वास्तविक व्यक्तियों की संख्या नहीं माना जा सकता, क्योंकि एक व्यक्ति के कई प्लेटफॉर्म पर खाते हो सकते हैं। फिर भी ये आँकड़े भारत में सोशल मीडिया की विशाल पहुँच और उसके बढ़ते महत्व को स्पष्ट करते हैं।

आज के युवा के लिए सोशल मीडिया एक ऐसी डिजिटल दुनिया बन चुका है जिसमें वह एक साथ विद्यार्थी, उपभोक्ता, निर्माता, दर्शक, ग्राहक और नागरिक की भूमिका निभा सकता है। इसलिए सोशल मीडिया के प्रभाव को केवल ‘अच्छा’ या ‘बुरा’ कहकर समझना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक प्रश्न यह है कि युवा इसका उपयोग किस उद्देश्य से, कितनी मात्रा में और किस प्रकार कर रहे हैं।

 युवा पीढ़ी पर सोशल मीडिया का सकारात्मक प्रभाव

1. शिक्षा के क्षेत्र में प्रभाव

सोशल मीडिया का सबसे महत्वपूर्ण सकारात्मक प्रभाव शिक्षा के क्षेत्र में दिखाई देता है। पहले विद्यार्थी को किसी विषय की अतिरिक्त जानकारी के लिए पुस्तकालय, शिक्षक या महँगी अध्ययन सामग्री पर निर्भर रहना पड़ता था। आज इंटरनेट और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने ज्ञान तक लोगों की पहुँच को बहुत आसान बना दिया है।

यूट्यूब पर विभिन्न विषयों के व्याख्यान, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, भाषा सीखने, विज्ञान के प्रयोग, इतिहास और भूगोल जैसी अध्ययन सामग्री उपलब्ध है। विद्यार्थी किसी कठिन विषय को एक से अधिक शिक्षकों से समझ सकता है और अपनी आवश्यकता के अनुसार अध्ययन सामग्री चुन सकता है।

भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में इसका विशेष महत्व है। ग्रामीण क्षेत्रों या छोटे शहरों में रहने वाले विद्यार्थियों को भी अब देश के प्रतिष्ठित शिक्षकों और विशेषज्ञों की सामग्री तक पहुँच मिल सकती है। इससे शिक्षा के अवसरों में भौगोलिक दूरी की बाधा कम हुई है।

2. रोजगार और स्वरोजगार के अवसर

रोजगार के क्षेत्र में भी सोशल मीडिया ने बड़ा परिवर्तन किया है। आज डिजिटल मार्केटिंग, कंटेंट क्रिएशन, वीडियो एडिटिंग, ग्राफिक डिजाइन, ऑनलाइन शिक्षण, सोशल मीडिया प्रबंधन और ई-कॉमर्स जैसे अनेक क्षेत्र युवाओं के लिए रोजगार और स्वरोजगार के अवसर पैदा कर रहे हैं।

पहले किसी छोटे व्यवसाय को प्रचार के लिए बड़े बजट की आवश्यकता होती थी, लेकिन अब एक छोटा व्यापारी सोशल मीडिया के माध्यम से अपने उत्पाद को स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक पहुँचाने का प्रयास कर सकता है।

युवा घर से छोटा व्यवसाय शुरू करके इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप या अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से ग्राहकों तक पहुँच बना सकते हैं। इसी प्रकार शिक्षक ऑनलाइन कक्षाएँ चला सकते हैं, कलाकार अपनी कला बेच सकते हैं और लेखक अपने विचारों को व्यापक रूप से पाठक वर्ग तक पहुँचा सकते हैं।

3. प्रतिभा प्रदर्शन का अवसर

प्रतिभा प्रदर्शन के क्षेत्र में भी सोशल मीडिया ने एक प्रकार का लोकतांत्रिक मंच प्रदान किया है। किसी युवा के पास यदि गायन, नृत्य, अभिनय, लेखन, चित्रकला, शिक्षण या किसी अन्य क्षेत्र में प्रतिभा है, तो वह बिना किसी बड़े संस्थान के सहयोग के उसे दुनिया के सामने प्रस्तुत कर सकता है। कई युवाओं ने इसी प्रकार डिजिटल प्लेटफॉर्म के माध्यम से अपनी पहचान बनाई है।

4. सामाजिक जागरूकता

सोशल मीडिया सामाजिक जागरूकता का भी शक्तिशाली माध्यम है। पर्यावरण संरक्षण, महिला सुरक्षा, शिक्षा, स्वास्थ्य, मतदान, आपदा सहायता और सामाजिक समस्याओं से जुड़े संदेश तेजी से बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँच सकते हैं।

किसी प्राकृतिक आपदा या संकट की स्थिति में सहायता की आवश्यकता वाले लोगों तक सूचना पहुँचाने में सोशल मीडिया उपयोगी साबित हो सकता है।

5. सामाजिक संपर्क

सोशल मीडिया का एक महत्वपूर्ण लाभ सामाजिक संपर्क भी है। दूर रहने वाले मित्रों और परिवार के सदस्यों के साथ संपर्क बनाए रखना आसान हो गया है। WHO के 2024 के अध्ययन के अनुसार, लगभग 36 प्रतिशत किशोरों ने मित्रों और अन्य लोगों के साथ लगातार ऑनलाइन संपर्क में रहने की जानकारी दी है।

इस प्रकार सोशल मीडिया ने दूरी को कम किया है और संवाद को तेज बनाया है। लेकिन यहीं से इसका दूसरा पक्ष भी सामने आता है—ऑनलाइन संपर्क बढ़ने के बावजूद वास्तविक सामाजिक संबंधों में संतुलन बनाए रखना आवश्यक है।

सोशल मीडिया के नकारात्मक प्रभाव और वर्तमान चुनौतियाँ 

सोशल मीडिया का सबसे सामान्य नकारात्मक प्रभाव समय के अनियंत्रित उपयोग के रूप में सामने आता है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म इस प्रकार डिजाइन किए जाते हैं कि उपयोगकर्ता लगातार नई सामग्री देखता रहे। एक वीडियो देखने के बाद दूसरा वीडियो, फिर तीसरा और उसके बाद लगातार नई सामग्री सामने आती रहती है। इसका परिणाम यह हो सकता है कि व्यक्ति कुछ मिनटों के लिए मोबाइल खोलता है लेकिन काफी लंबा समय सोशल मीडिया पर बीत जाता है। युवाओं के लिए यह समस्या इसलिए अधिक महत्वपूर्ण है क्योंकि विद्यार्थी जीवन में समय का उपयोग सीधे उनकी शिक्षा और भविष्य को प्रभावित करता है। यदि पढ़ाई के समय बार-बार मोबाइल नोटिफिकेशन, रील या संदेश ध्यान भटकाते हैं, तो एकाग्रता कम हो सकती है। इसी प्रकार नौकरी या अन्य कार्य करते समय लगातार सोशल मीडिया देखने की आदत कार्यक्षमता को प्रभावित कर सकती है।

दूसरी महत्वपूर्ण चुनौती मानसिक और सामाजिक कल्याण से जुड़ी है। WHO के यूरोपीय क्षेत्र की 2024 की रिपोर्ट में 44 देशों एवं क्षेत्रों के लगभग 2.8 लाख किशोरों के आंकड़ों का अध्ययन किया गया। इसमें पाया गया कि 2022 में 11% किशोरों में सोशल मीडिया के समस्याग्रस्त उपयोग के लक्षण थे, जबकि 2018 में यह दर 7% थी। लड़कियों में यह अनुपात 13%, जबकि लड़कों में 9% दर्ज किया गया।

समस्याग्रस्त उपयोग का अर्थ केवल सोशल मीडिया का अधिक उपयोग करना नहीं है। इसमें उपयोग को नियंत्रित करने में कठिनाई, सोशल मीडिया न इस्तेमाल करने पर बेचैनी, अन्य महत्वपूर्ण गतिविधियों की उपेक्षा और दैनिक जीवन पर नकारात्मक प्रभाव जैसी स्थितियाँ शामिल होती हैं।  सोशल मीडिया का एक और प्रभाव सामाजिक तुलना है। सोशल मीडिया पर लोग सामान्यतः अपने जीवन के अच्छे और आकर्षक क्षण अधिक प्रदर्शित करते हैं। किसी व्यक्ति की सफलता, महँगी वस्तुएँ, यात्राएँ, सुंदर तस्वीरें या उपलब्धियाँ देखकर युवा अपने जीवन की तुलना उससे करने लग सकता है। लेकिन उसे यह दिखाई नहीं देता कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली तस्वीर पूरे जीवन की वास्तविकता नहीं होती। इस तुलना से कभी-कभी असंतोष, हीन भावना और आत्मविश्वास में कमी की स्थिति उत्पन्न हो सकती है। इसलिए युवाओं के लिए यह समझना आवश्यक है कि सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाली सामग्री वास्तविक जीवन का पूर्ण चित्र नहीं होती।

सोशल मीडिया का संबंध नींद और दैनिक दिनचर्या से भी है। विशेष रूप से रात में लंबे समय तक मोबाइल चलाने से सोने का समय प्रभावित हो सकता है।  एक स्वस्थ युवा जीवन के लिए पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि, खेल, अध्ययन और परिवार के साथ समय आवश्यक है। यदि इन गतिविधियों की जगह लगातार स्क्रीन ले लेती है, तो डिजिटल सुविधा जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करने लगती है।

फेक न्यूज़ और गलत सूचना सोशल मीडिया की दूसरी बड़ी चुनौती है। किसी सूचना को सत्यापित किए बिना साझा करना आज बहुत आसान है। पुरानी तस्वीर को नई घटना के रूप में प्रस्तुत करना, झूठी खबर फैलाना, गलत आँकड़े साझा करना या किसी व्यक्ति के बारे में अफवाह फैलाना कुछ ही समय में हजारों लोगों तक पहुँच सकता है। युवा इस समस्या से विशेष रूप से प्रभावित हो सकते हैं क्योंकि वे सोशल मीडिया के सक्रिय उपयोगकर्ता हैं। इसलिए आज केवल पढ़ना-लिखना जानना पर्याप्त नहीं है। डिजिटल साक्षरता और मीडिया साक्षरता भी आवश्यक है। युवा को यह जानना चाहिए कि किसी सूचना का स्रोत क्या है, वह कब प्रकाशित हुई है, क्या अन्य विश्वसनीय स्रोत भी उसी जानकारी की पुष्टि कर रहे हैं और क्या तस्वीर या वीडियो वास्तव में उसी घटना से संबंधित है। सोशल मीडिया से जुड़ी एक अन्य गंभीर समस्या साइबर अपराध है। फर्जी प्रोफाइल, पहचान की चोरी, अकाउंट हैकिंग, ऑनलाइन धोखाधड़ी, साइबर बुलिंग और प्रतिरूपण जैसी घटनाएँ डिजिटल सुरक्षा को चुनौती देती हैं।

भारत सरकार के गृह मंत्रालय द्वारा राज्यसभा में 18 मार्च 2026 को दी गई जानकारी के अनुसार, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल (NCRP) पर दर्ज शिकायतों में डिजिटल पहचान के दुरुपयोग से जुड़े मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। आंकड़ों के अनुसार, Fake/Impersonating Profile से संबंधित शिकायतें वर्ष 2021 में 15,843 थीं, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 46,784 हो गईं। इस प्रकार इन मामलों में लगभग 195.3 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इसी तरह, Profile Hacking/Identity Theft से संबंधित शिकायतों की संख्या 2021 में 10,650 से बढ़कर 2025 में 34,533 हो गई, जो लगभग 224.2 प्रतिशत की वृद्धि को दर्शाती है। इन आंकड़ों से स्पष्ट होता है कि साइबर अपराध का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। यह समस्या अब केवल ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि डिजिटल पहचान की चोरी, फर्जी प्रोफाइल और पहचान के दुरुपयोग जैसी गतिविधियां भी गंभीर चुनौती बनती जा रही हैं। डिजिटल पहचान के इस प्रकार के दुरुपयोग से नागरिकों की निजता और सुरक्षा प्रभावित होने के साथ-साथ सरकारी डिजिटल सेवाओं, कल्याणकारी योजनाओं में लाभार्थियों की पहचान तथा सामाजिक और संस्थागत व्यवस्था पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

इन आँकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म के बढ़ते उपयोग के साथ साइबर सुरक्षा का महत्व भी बढ़ रहा है। युवाओं को मजबूत पासवर्ड, दो-स्तरीय सुरक्षा, गोपनीयता की सेटिंग और संदिग्ध लिंक से बचने जैसी बुनियादी डिजिटल सुरक्षा की जानकारी होनी चाहिए। OTP, बैंक विवरण या पासवर्ड किसी अनजान व्यक्ति के साथ साझा करना गंभीर जोखिम पैदा कर सकता है। सोशल मीडिया का प्रभाव व्यक्तिगत गोपनीयता पर भी पड़ता है। युवा कई बार बिना सोचे अपनी तस्वीरें, स्थान, विद्यालय, कॉलेज, परिवार या व्यक्तिगत जानकारी साझा कर देते हैं। डिजिटल दुनिया में एक बार सार्वजनिक की गई जानकारी को पूरी तरह हटाना हमेशा आसान नहीं होता। इसलिए ‘सोचकर पोस्ट करना’ डिजिटल नागरिकता का महत्वपूर्ण नियम होना चाहिए। एक अन्य चुनौती सोशल मीडिया पर साइबर बुलिंग है। किसी व्यक्ति के बारे में अपमानजनक टिप्पणी, मजाक, धमकी या लगातार परेशान करना उसके आत्मविश्वास और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है। विद्यालय और परिवार दोनों को युवाओं को यह समझाना चाहिए कि ऑनलाइन व्यवहार भी वास्तविक जीवन के व्यवहार जितना ही जिम्मेदार होना चाहिए।

 संतुलित उपयोग की आवश्यकता 

सोशल मीडिया से जुड़ी समस्याओं का समाधान सोशल मीडिया को पूरी तरह छोड़ देना नहीं है। आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय और सामाजिक संपर्क का महत्वपूर्ण माध्यम बन चुका है। इसलिए आवश्यकता इसके संतुलित और जिम्मेदार उपयोग की है।

सबसे पहले युवाओं को अपने उपयोग का उद्देश्य तय करना चाहिए। यदि सोशल मीडिया का उपयोग शिक्षा, कौशल विकास या रोजगार के लिए किया जा रहा है, तो उसका लाभ अधिक हो सकता है। लेकिन यदि उपयोग केवल बिना उद्देश्य के लगातार स्क्रॉल करने तक सीमित हो जाता है, तो समय और ऊर्जा दोनों की हानि हो सकती है। समय प्रबंधन इस समस्या का महत्वपूर्ण समाधान है। युवाओं को पढ़ाई, काम और आराम के दौरान सोशल मीडिया से दूरी बनाए रखने का अभ्यास करना चाहिए। आवश्यक होने पर नोटिफिकेशन बंद किए जा सकते हैं। सोने से पहले लंबे समय तक मोबाइल देखने की आदत से बचना भी उपयोगी है। दूसरा महत्वपूर्ण उपाय डिजिटल डिटॉक्स या समय-समय पर सोशल मीडिया से दूरी बनाना है। इसका अर्थ तकनीक को पूरी तरह छोड़ना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि तकनीक हमारे समय और व्यवहार को पूरी तरह नियंत्रित न करे। तीसरा उपाय डिजिटल साक्षरता है। किसी भी समाचार को साझा करने से पहले उसकी सत्यता जाँचनी चाहिए। केवल शीर्षक पढ़कर निष्कर्ष नहीं निकालना चाहिए। विश्वसनीय समाचार स्रोतों, सरकारी वेबसाइटों और आधिकारिक संस्थाओं की जानकारी को प्राथमिकता देना चाहिए।  चौथा उपाय ऑनलाइन सुरक्षा है। युवाओं को मजबूत पासवर्ड, दो-स्तरीय प्रमाणीकरण, गोपनीयता सेटिंग और साइबर अपराध की रिपोर्टिंग की प्रक्रिया के बारे में जानकारी होनी चाहिए। किसी अनजान व्यक्ति के भेजे लिंक पर क्लिक करने या व्यक्तिगत जानकारी साझा करने से बचना चाहिए।

अभिभावकों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। बच्चों और युवाओं को केवल मोबाइल चलाने से रोकना स्थायी समाधान नहीं है। उन्हें यह समझाना आवश्यक है कि सोशल मीडिया का सुरक्षित उपयोग कैसे किया जाए। परिवार में ऐसा वातावरण होना चाहिए जहाँ युवा ऑनलाइन किसी समस्या का सामना करने पर बिना डर के अपने माता-पिता या किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात कर सकें। शिक्षण संस्थानों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। विद्यालयों और विश्वविद्यालयों में डिजिटल नागरिकता, साइबर सुरक्षा, फेक न्यूज़ की पहचान, ऑनलाइन गोपनीयता और सोशल मीडिया के जिम्मेदार उपयोग से संबंधित जागरूकता कार्यक्रम चलाए जाने चाहिए।

सरकार और सोशल मीडिया कंपनियों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। डिजिटल प्लेटफॉर्म को उपयोगकर्ताओं की सुरक्षा, बच्चों और किशोरों की सुरक्षा, गलत सूचना से निपटने तथा साइबर अपराधों की शिकायतों पर प्रभावी कार्रवाई के लिए लगातार बेहतर व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि युवा सोशल मीडिया को साधन मानें, जीवन का केंद्र नहीं। पुस्तकों को पढ़ना, खेलना, व्यायाम करना, परिवार से बातचीत करना, मित्रों से आमने-सामने मिलना और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष 

सोशल मीडिया आधुनिक समाज की वास्तविकता बन चुका है। भारत जैसे युवा देश में इसका प्रभाव आने वाले वर्षों में और बढ़ने की संभावना है। डिजिटल तकनीक ने युवाओं को ऐसी सुविधाएँ प्रदान की हैं जिनकी कल्पना कुछ दशक पहले कठिन थी। आज ज्ञान कुछ क्लिक की दूरी पर है, प्रतिभा को वैश्विक मंच मिल सकता है, छोटे व्यवसाय बड़े बाजार तक पहुँच सकते हैं और युवा अपने विचारों को व्यापक समाज तक पहुँचा सकते हैं। लेकिन हर तकनीक की तरह सोशल मीडिया का प्रभाव उसके उपयोग पर निर्भर करता है। अनियंत्रित उपयोग समय की बर्बादी, पढ़ाई में बाधा, नींद में व्यवधान, सामाजिक तुलना, गलत सूचना और साइबर अपराध जैसी समस्याओं को जन्म दे सकता है। WHO के आँकड़ों में समस्याग्रस्त सोशल मीडिया उपयोग के संकेतों में वृद्धि इस बात की ओर ध्यान दिलाती है कि युवाओं के डिजिटल व्यवहार को स्वस्थ और संतुलित बनाना आवश्यक है।

भारत में फर्जी प्रोफाइल और पहचान चोरी से संबंधित साइबर अपराध की रिपोर्टों में वृद्धि भी यह बताती है कि डिजिटल दुनिया में अवसरों के साथ जोखिम भी मौजूद हैं।

इसलिए आज आवश्यकता सोशल मीडिया का विरोध करने की नहीं, बल्कि डिजिटल विवेक विकसित करने की है। युवा यह तय करें कि उन्हें क्या देखना है, कितना देखना है, किस सूचना पर विश्वास करना है और क्या साझा करना है। अभिभावक और शिक्षक उन्हें सही मार्गदर्शन दें तथा सरकार और डिजिटल प्लेटफॉर्म सुरक्षित डिजिटल वातावरण बनाने की दिशा में काम करें। इस प्रकार सोशल मीडिया को न तो पूर्णतः वरदान कहा जा सकता है और न ही अभिशाप। यह एक शक्तिशाली उपकरण है। इसके परिणाम इस बात पर निर्भर करते हैं कि उसका उपयोग कौन, किस उद्देश्य से और किस प्रकार करता है। सोशल मीडिया का सही उपयोग युवा शक्ति को ज्ञान, कौशल और अवसर से जोड़ सकता है; वहीं इसका अनियंत्रित उपयोग उसी युवा शक्ति के समय, ध्यान और क्षमता को कमजोर कर सकता है। इसलिए डिजिटल युग की सबसे बड़ी आवश्यकता सोशल मीडिया से दूरी नहीं, बल्कि उसके प्रति जिम्मेदार और संतुलित दृष्टिकोण है।