• By Satyam Prajapati
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  • सामयिक विमर्श
  • 24 Aug, 2026

मंडल के सवाल: सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व की आज की बहस

“मंडल आयोग ने पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। आज भी समान अवसर और समान प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की बहस में मंडल आयोग की प्रासंगिकता बनी हुई है।”

मंडल के सवाल आज भी क्यों जरूरी हैं?

25 अगस्त को बी.पी. मंडल की जयंती है। भारतीय राजनीति और सामाजिक न्याय के संदर्भ में बिन्देश्वरी प्रसाद का नाम मंडल आयोग के साथ जुड़ा है। संविधान के अनुच्छेद 340 के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति का अध्ययन करने के लिए केंद्र सरकार ने 1979 में द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन किया था। तत्कालीन जनता पार्टी सरकार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल को इसका अध्यक्ष बनाया। आयोग ने देश के विभिन्न हिस्सों का अध्ययन करने के बाद 31 दिसंबर 1980 को अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी। यह पिछड़े वर्ग के लिए इतिहास की सबसे बड़ी सुधार के रूप में देखी जाने वाली रिपोर्ट थी।  

मंडल आयोग का गठन अचानक हुई कोई राजनीतिक प्रक्रिया नहीं थी। संविधान निर्माताओं ने सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति सुधारने के लिए राज्य को विशेष उपाय करने की जिम्मेदारी दी थी। इसी संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत अनुच्छेद 340 में पिछड़े वर्गों की स्थिति की जांच के लिए आयोग गठित करने का प्रावधान किया गया। मंडल आयोग से पहले भी काका कालेलकर आयोग का गठन किया गया था, जिसने 1955 में अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। हालांकि उसकी सिफारिशों को व्यापक रूप से लागू नहीं किया गया। इस पृष्ठभूमि में मंडल आयोग का गठन पिछड़े वर्गों की स्थिति पर केंद्र स्तर पर एक महत्वपूर्ण पहल थी।

मंडल आयोग ने पिछड़ेपन की पहचान के लिए सामाजिक, शैक्षणिक और आर्थिक आधारों से जुड़े कुल 11 संकेतकों का इस्तेमाल किया। आयोग ने 3,743 जातियों और समुदायों को अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में रखा। उपलब्ध आंकड़ों और 1931 की जनगणना के आधार पर आयोग ने देश की ओबीसी आबादी का अनुमान लगभग 52 प्रतिशत लगाया। आयोग ने यह भी पाया कि सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व उनकी अनुमानित आबादी की तुलना में काफी कम था। इस स्थिति को देखते हुए आयोग ने सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण की सिफारिश की।

मंडल आयोग की सिफारिश केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं थी। आयोग ने पिछड़े वर्गों की शैक्षणिक स्थिति सुधारने, तकनीकी और व्यावसायिक शिक्षा में अवसर बढ़ाने तथा उनके सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए कई अन्य उपाय सुझाए। आयोग का मूल आधार यह था कि सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को केवल आर्थिक स्थिति के आधार पर नहीं समझा जा सकता। भारतीय समाज में जाति सामाजिक स्थिति और अवसरों को प्रभावित करने वाला एक महत्वपूर्ण तत्व रही है। इसलिए पिछड़े वर्गों की पहचान में सामाजिक संकेतो की प्रमुखता दी गयी। 

रिपोर्ट प्रस्तुत होने के बाद भी इसे तत्काल लागू नहीं किया गया। लगभग एक दशक तक मंडल आयोग की सिफारिशें केंद्र सरकार के स्तर पर लंबित रहीं। 7 अगस्त 1990 को तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की घोषणा की। इसके बाद देश के विभिन्न हिस्सों में आरक्षण के समर्थन और विरोध में आंदोलन हुए। इस निर्णय ने भारतीय राजनीति को भी काफी प्रभावित किया और यहीं से पिछड़े वर्गों की राजनीतिक लामबंदी को नई गति मिली।

मंडल आयोग की सिफारिशों को लेकर मामला सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचा। 1992 में इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण को संवैधानिक रूप से स्वीकार किया, लेकिन इसके साथ कुछ महत्वपूर्ण शर्तें भी निर्धारित कीं। न्यायालय ने ‘क्रीमी लेयर’ को आरक्षण के लाभ से बाहर रखने का सिद्धांत स्थापित किया और सामान्य परिस्थितियों में आरक्षण की कुल सीमा 50 प्रतिशत रखने की बात कही। इस फैसले ने भारत की आरक्षण व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी आधार तैयार किया।

बी.पी. मंडल का योगदान इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए। वे केवल मंडल आयोग के अध्यक्ष नहीं थे, बल्कि बिहार की राजनीति में सक्रिय रहे और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व के सवाल को राजनीतिक विमर्श में उठाते रहे। 25 अगस्त 1918 को जन्मे बी.पी. मंडल बिहार के मुख्यमंत्री भी रहे। मंडल आयोग के अध्यक्ष के रूप में उन्होंने देश के विभिन्न हिस्सों से प्राप्त सूचनाओं और उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर पिछड़े वर्गों की सामाजिक और शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन कराया। 

मंडल आयोग के बाद भारतीय राजनीति में महत्वपूर्ण परिवर्तन देखने को मिले। विशेष रूप से उत्तर भारत में पिछड़े वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ी। कई राजनीतिक दलों और क्षेत्रीय आंदोलनों ने सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व को अपने राजनीतिक एजेंडे का प्रमुख हिस्सा बनाया। इसका प्रभाव केवल चुनावी राजनीति तक सीमित नहीं रहा, बल्कि सरकारी संस्थाओं और सार्वजनिक जीवन में प्रतिनिधित्व को लेकर भी बहस तेज हुई।

आज आरक्षण को लेकर बहस एक बार फिर महत्वपूर्ण है। आरक्षण की व्यवस्था पर समय-समय पर यह सवाल उठता रहा है कि क्या इसे जारी रखा जाना चाहिए, इसका आधार सामाजिक और जातिगत पिछड़ापन होना चाहिए या आर्थिक स्थिति को भी प्रमुख आधार बनाया जाना चाहिए। आरक्षण के आलोचक इसे योग्यता और समान अवसर के प्रश्न से जोड़ते हैं, जबकि इसके समर्थकों का तर्क है कि भारतीय समाज में सामाजिक पिछड़ापन अभी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है और इसलिए प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आरक्षण की आवश्यकता बनी हुई है।

इस बहस में एक ज़रूरी अंतर समझना आवश्यक है। आर्थिक कमजोरी और सामाजिक पिछड़ापन दोनों अलग है। आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति को आर्थिक सहायता, छात्रवृत्ति या अन्य कल्याणकारी योजनाओं की आवश्यकता हो सकती है, जबकि सामाजिक रूप से पिछड़े समुदायों के लिए प्रतिनिधित्व और अवसरों में भागीदारी का प्रश्न है। इसी कारण संविधान और कानूनों में विभिन्न प्रकार की सकारात्मक कार्रवाई के प्रावधान विकसित हुए हैं। आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए इडब्लूएस आरक्षण की व्यवस्था भी इसी व्यापक बहस का हिस्सा है।

हालांकि आरक्षण की वर्तमान व्यवस्था में सुधार के सवाल को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। ओबीसी आरक्षण के संदर्भ में क्रीमी लेयर का प्रभावी क्रियान्वयन किया गया है, लेकिन ज़रूरी है कि ठीक तरीके से पिछड़े और अतिपिछड़े समुदाय को मिलने वाला आरक्षण उन्हें मिल जाए, सरकारी नौकरियों में सीटों का बंटवारा अतार्किक हो रहा है। मेरिट का आधार और कटऑफ पर भी अनेको स्वाल बने हैं। आज के परिप्रेक्ष्य में आरक्षण से जुड़े निर्णयों के लिए विश्वसनीय और अद्यतन आंकड़ों की आवश्यकता भी लगातार महसूस की जा रही है। मंडल आयोग की रिपोर्ट ऐसे समय में तैयार हुई थी जब जातिगत सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों की उपलब्धता सीमित थी। आज शिक्षा, रोजगार, सरकारी सेवाओं में प्रतिनिधित्व और सामाजिक-आर्थिक स्थिति से जुड़े अधिक व्यापक आंकड़े जुटाकर नीतियों की समीक्षा की जा सकती है। इससे आरक्षण से संबंधित निर्णयों को अधिक तथ्यपरक बनाने में मदद मिलेगी।

साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि आरक्षण सामाजिक असमानता दूर करने का अकेला माध्यम नहीं है। सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता, उच्च शिक्षा तक पहुंच, छात्रवृत्ति, कौशल विकास और रोजगार के पर्याप्त अवसर भी जरूरी हैं। यदि शिक्षा और रोजगार की बुनियादी व्यवस्था में असमानता बनी रहती है, तो केवल आरक्षण के माध्यम से समान अवसर का लक्ष्य हासिल करना कठिन होगा। इसलिए सामाजिक न्याय की नीति को आरक्षण के साथ शिक्षा और आर्थिक अवसरों की व्यापक नीति से जोड़ना जरूरी है।

आरक्षण को लेकर होने वाली बहस में यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इसे केवल राजनीतिक नारे के स्तर पर न देखा जाए। आरक्षण की आवश्यकता, उसकी सीमा, उसके लाभार्थियों और उसके प्रभाव का अध्ययन आंकड़ों और संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर होना चाहिए। इसी तरह आरक्षण की आलोचना भी तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए। केवल यह कहना कि आरक्षण योग्यता के विरुद्ध है या दूसरी ओर यह कहना कि आरक्षण में किसी प्रकार के सुधार की आवश्यकता नहीं है-दोनों ही दृष्टिकोण ठीक नहीं है। 

-सत्यम प्रजापति  
सामयिक विमर्शकार

मंडल आयोग की सबसे महत्वपूर्ण विरासत यही है कि उसने पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व के प्रश्न को राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में ला दिया। उसके बाद भारतीय राजनीति में सामाजिक प्रतिनिधित्व को लेकर जिस स्तर की चर्चा शुरू हुई, वह आज भी जारी है। बी.पी. मंडल का योगदान इसी ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

मंडल जयंती पर आरक्षण को लेकर बहस को समाप्त करने के बजाय उसे अधिक तथ्यपरक बनाने की जरूरत है। सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन की वर्तमान स्थिति क्या है, आरक्षण का लाभ किन वर्गों तक पहुंच रहा है, किन समुदायों की भागीदारी अभी भी कम है और व्यवस्था में किस प्रकार के सुधार की आवश्यकता है-इन सवालों पर उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर चर्चा होनी चाहिए। आरक्षण की समीक्षा हो सकती है, लेकिन सामाजिक असमानता और प्रतिनिधित्व के प्रश्न को नजरअंदाज करके नहीं। मंडल आयोग की प्रासंगिकता आज भी इसी सवाल में निहित है कि लोकतंत्र में समान अवसर और समान प्रतिनिधित्व को व्यवहार में किस तरह सुनिश्चित किया जाए।