• By शालिनी राय 'डिम्पल'
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  • संस्मरण
  • 03 Sep, 2026

जागते रहो… कुछ आवाज़ें डराने के लिए नहीं होतीं

बचपन में “जागते रहो” की आवाज़ मेरे लिए डर थी, लेकिन समय के साथ समझ आया कि वह हमारी सुरक्षा के लिए जागते एक इंसान की जिम्मेदारी थी। आज वही आवाज़ मुझे याद दिलाती है कि कुछ आवाज़ें डराने के लिए नहीं, बल्कि हमें महफ़ूज़ रखने के लिए होती हैं।

संस्मरण

कुछ आवाज़ें केवल कानों से नहीं सुनी जातीं, वे मन की तहों में उतर जाती हैं। बचपन में सुनी हुई कोई पुकार, किसी अपने की आवाज़, बारिश की टप-टप, मंदिर की घंटियों की ध्वनि या फिर रात के सन्नाटे को चीरती किसी चौकीदार की आवाज़, समय बीत जाने के बाद भी मन के किसी कोने में वैसी ही सुरक्षित रह जाती है। उम्र आगे बढ़ जाती है, शहर बदल जाते हैं, घर बदल जाते हैं, जीवन अपने साथ न जाने कितनी नई स्मृतियाँ जोड़ देता है, मगर बचपन की कोई एक ध्वनि अचानक वर्षों बाद लौट आए तो लगता है जैसे समय ने पलटकर उसी जगह ला खड़ा किया हो, जहाँ हम कभी बहुत छोटे थे।

मेरे बचपन की स्मृतियों में भी ऐसी ही एक आवाज़ दर्ज है…

“जागते रहो… जागते रहो”

और उसके साथ बजती एक तीखी-सी व्हिसिल।

मैं उन दिनों प्रयागराज के नैनी क्षेत्र के गाँधीनगर में रहती थी। रात होते-होते जब गलियाँ सुनसान होने लगतीं, घरों की खिड़कियाँ बंद हो जातीं और अँधेरा धीरे-धीरे पूरी बस्ती को अपने आगोश में ले लेता, तब चौकीदार काका अपनी ड्यूटी पर निकलते।

उनकी आवाज़ रात के सन्नाटे को चीरती हुई आती…

“जागते रहो… जागते रहो”

और फिर एक तेज़ व्हिसिल।

पता नहीं क्यों, उस आवाज़ में मुझे सुरक्षा का आश्वासन नहीं, एक अनजाना भय सुनाई देता था..! बालमन भला क्या समझता कि चौकीदार की यह पुकार किसी डरावनी चीज़ की आहट नहीं, बल्कि हमारी सुरक्षा के लिए रात भर जागते रहने वाले एक इंसान की जिम्मेदारी है..! मेरे लिए तो वह आवाज़ अँधेरी रात, सुनसान गलियों और किसी अनदेखे भय का पर्याय बन चुकी थी..!

यह डर इतना गहरा था कि रात में वॉशरूम जाने के लिए भी मैं पापा-मम्मी को जगाया करती..!

पुराने ज़माने के घरों में वॉशरूम घर से अटैच नहीं हुआ करते थे। वह घर से अलग बनाए जाते थे। इसलिए मेरा अकेले बाहर निकलने का तो सवाल ही नहीं था..!

एक दिन पापा ने चौकीदार काका को रोककर मुझसे बात करने को कहा। मगर जैसे ही वे मेरे सामने आए, मैं सहमी हुई पापा की गोद में और सिमट गई। काका ने शायद मेरी आँखों में अपना डर देख लिया था। उन्होंने बहुत प्यार से कहा,

“बिटियारानी, हम हैं.. हम कोई भूत-वूत नहीं हैं। हम भी तुम्हारे पापा की तरह इंसान ही हैं।”

मैंने उनकी बात मान तो ली कि वे भी हमारी तरह इंसान ही हैं, लेकिन मन का डर तर्क कहाँ मानता है..! चौकीदार काका की आवाज़ और उनकी व्हिसिल मेरे लिए फिर भी उतनी ही डरावनी बनी रही..!

समय बीतता गया…

मैं बड़ी होती गई। शहर बदले, घर बदले, जीवन में न जाने कितने लोग और कितनी स्मृतियाँ जुड़ती चली गईं..! बचपन की वह आवाज़ भी धीरे-धीरे स्मृतियों की भीड़ में कहीं दब गई..!

मगर शायद कुछ डर हमारे भीतर से पूरी तरह नहीं जाते.. वे बस चुपचाप किसी कोने में सो जाते हैं..!

सन् 2003 की बात है…

मैं महाराष्ट्र के चितळसर-मानपाड़ा, ठाणे में अपने नाना जी के बंगले में परनानी के साथ सोई हुई थी। रात के लगभग बारह बजे अचानक मेरी नींद खुली और मैं घबराकर उठ बैठी..!

मेरे कानों में वही आवाज़ लगातार गूँज रही थी…

“जागते रहो… जागते रहो”

और उसके साथ वही व्हिसिल!

उफ़्फ़!

ठंड की उस रात में भी मेरे माथे पर पसीना आ गया..! मैं कुछ क्षणों तक समझ ही नहीं पाई कि हो क्या रहा है..! फिर अचानक बचपन की वही स्मृति मेरे सामने जीवित हो उठी..!

मैं हैरान थी कि जिस बात को भुलाए हुए मुझे बरसों बीत चुके थे, वही डर आज फिर मेरे भीतर उसी तीव्रता से कैसे लौट आया..?

मैंने परनानी को जगाया।

“नानी… मुझे डर लग रहा है..! मुझे नींद भी नहीं आ रही..!”

उन्होंने घबराकर पूछा,

“क्या हुआ बाबू?”

मैंने लगभग शिकायत के लहज़े में कहा,

“नानी, चौकीदार अंकल को मना कीजिए न.. वो इतनी डरावनी आवाज़ में बोलते हैं कि मैं पूरी रात नहीं सो पाऊँगी..!”

परनानी ने बड़े सहज भाव से कहा,

“वो अपनी ड्यूटी कर रहा है बेटा। इसी बात की तो हम लोग उसे तनख़्वाह देते हैं।”

मैं चुप हो गई..!

परनानी मेरे माथे पर हाथ फेरती रहीं। कभी बालों में उँगलियाँ फेरतीं, कभी पीठ सहलातीं। उनका स्पर्श जैसे मुझे भरोसा दे रहा था कि डरने की कोई बात नहीं है। लेकिन उस रात मेरा भय जैसे वर्षों की दूरी लाँघकर मेरे पास लौट आया था.. मैं उनसे लिपट गई..!

परनानी ने शायद मेरे भीतर के डर को मेरी बातों से अधिक मेरे चेहरे पर पढ़ लिया था..!

उन्होंने अपने कमरे में लगे एक स्विच को दबाया। उसके साथ ही नाना जी के कमरे में घंटी बजी। नाना जी लगभग भागते हुए आए। उन्हें लगा कि परनानी को कोई परेशानी हो गई है।

लेकिन जब उन्हें पता चला कि मैं चौकीदार की आवाज़ और व्हिसिल से डर रही हूँ, तो वे हँस पड़े।

मुझे उनकी हँसी अच्छी नहीं लगी.. मैं थोड़ी और रुआँसी हो गई..!

शायद उन्हें लगा कि इस समय मेरे डर को समझाने से अधिक जरूरी है, उसे दूर करना।

वे तुरंत बाहर गए और चौकीदार अंकल से कहा,

“तुम पूरे कम्पाउंड का चक्कर लगाओ, लेकिन इस तरफ मत आना.. हमारी बच्ची डर रही है..!”

चौकीदार अंकल दूसरी ओर चले गए।

कुछ देर बाद उनकी आवाज़ बहुत दूर से सुनाई दे रही थी। इतनी धीमी कि हमारी बातचीत में वह लगभग सुनाई ही नहीं देती थी।

मेरी वजह से उस रात परनानी और नाना जी लगभग चार बजे तक जागते रहे। वे शायद इस इंतज़ार में थे कि कब मेरी आँखों पर नींद उतर आए और मैं चैन से सो जाऊँ।

आख़िरकार मेरी पलकों बोझिल होने लगीं..!

मुझे पता ही नहीं चला कि कब मैं सो गई।

जब आँख खुली तो सुबह नहीं, दिन के लगभग ग्यारह बज चुके थे।

मेरी नींद खोलने के लिए परनानी की वही मीठी आवाज़ मेरे कानों में उतर रही थी…

“उठो लाल अब आँखें खोलो,
 पानी लाई हूँ मुँह धोलो…”

अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की इस कविता के पूरे होने के साथ मेरी आँखें पूरी तरह खुल गईं।

मैंने नानी को ज़ोर से गले लगा लिया और कहा…

“नानी, आप जब मेरे लिए यह कविता गाती हो न, तो मेरा मन करता है कि मैं बस सोई रहूँ और आप मुझे यही सुनाती रहो। मेरा उठने का बिल्कुल भी मन नहीं करता।”

इतने में नानी आकर परनानी को टोकतीं…

“बच्ची को क्यों जगा रही हो माँजी, सोने दो उसे।”

और परनानी मेरे देर तक सोने से भी घबरा जातीं। कई बार मेरी नब्ज़ तक टटोल लेतीं.. मानो यह सुनिश्चित कर लेना चाहती हों कि मैं ठीक हूँ..!

तब मुझे उनकी यह आदत थोड़ी अजीब लगती थी..! आज सोचती हूँ तो लगता है.. उम्र के उस पड़ाव पर पहुँचकर शायद मृत्यु का भय अपने लिए उतना नहीं रहता, जितना अपनों को खो देने का होता है..!

अपने किसी प्रिय का देर तक सोना भी आशंका उत्पन्न कर देता है..!

बचपन में मुझे चौकीदार की आवाज़ डराती थी।

और उस रात शायद मेरी निःशब्द नींद परनानी को डरा चुकी थी।

डर भी कितना अजीब होता है न..?

कभी वह हमारे भीतर होता है और कभी हमारी चिंता बनकर किसी दूसरे के भीतर..!

उस घटना के बाद जब तक मैं वहाँ रही, चौकीदार अंकल कभी हमारे कमरे की तरफ नहीं आए। वे अपनी ड्यूटी करते रहे, मगर मेरी नींद की हिफ़ाज़त करते हुए कुछ दूर से ही अपनी आवाज़ लगाते रहे..!

और मैं कई महीनों तक रात में सुकून से सोती रही।

समय फिर आगे बढ़ गया…

उस घटना को भी बरसों बीत गए।

लेकिन एक बात आज तक अनुत्तरित है।

उस रात के बाद मुझे फिर कभी वह आवाज़ सुनाई नहीं दी..!

“जागते रहो… जागते रहो”

मुझे नहीं मालूम कि मेरे भीतर से वह डर सचमुच निकल गया है या अब भी कहीं किसी कोने में सोया हुआ है। शायद इसका उत्तर मुझे तभी मिलेगा, जब किसी रात अचानक फिर वही आवाज़ किसी सुनसान सड़क से उठेगी, हवा को चीरती हुई मेरे कानों तक पहुँचेगी और उसके साथ कोई व्हिसिल सुनाई देगी..!

तब पता चलेगा कि वह डर सच में पीछे छूट गया है या समय ने बस उसे कुछ देर के लिए सुला दिया था..!

लेकिन आज जब मैं उस घटना को याद करती हूँ, तो उस आवाज़ में मुझे पहले जैसा खौफ़ सुनाई नहीं देता..!

अब उसमें मुझे एक जागते हुए इंसान की जिम्मेदारी सुनाई देती है।

“जागते रहो… जागते रहो”

कितना सरल, कितना गहरा संदेश है..!

वह आवाज़ हमें डराने के लिए नहीं थी। वह तो यह बताने के लिए थी कि जब पूरी बस्ती सो रही है, तब कोई एक व्यक्ति हमारी सुरक्षा के लिए जाग रहा है।

और शायद यही उस स्मृति का सबसे सुंदर अर्थ है।

मेरे बचपन की उन रातों में महज़ चौकीदार ही नहीं जाग रहा था…

मेरे लिए मेरे पापा जाग रहे थे।

मेरे लिए मेरी मम्मी जाग रही थीं।

मेरे लिए मेरी परनानी जाग रही थीं।

मेरे लिए मेरे नाना जी जाग रहे थे।

और सबसे बढ़कर.. उन सबके भीतर मेरे लिए जो प्रेम था, वह जाग रहा था।

शायद इसी प्रेम ने मेरे बचपन के सबसे पुराने डर को एक दिन एक मीठी स्मृति में बदल दिया।

आज भी कभी किसी शांत रात में दूर से आती किसी अनजान आवाज़ की कल्पना करती हूँ तो मन में भय नहीं उठता। बल्कि लगता है, अँधेरी रात के उस पार कोई अब भी कह रहा है…

“जागते रहो… जागते रहो”

और उसी स्मृति के आँगन से परनानी की ममता भरी आवाज़ भी सुनाई देती है…

“उठो लाल अब आँखें खोलो..!”

तब लगता है, बचपन कहीं गया ही नहीं।

वह आज भी वहीं है.. पापा-मम्मी की गोद में सिमटा हुआ, नाना-नानी और परनानी के प्रेम से महफ़ूज़, और रात के सन्नाटे में किसी दूर जाती व्हिसिल को सुनकर यह समझने की कोशिश करता हुआ कि…

हर जागती हुई आवाज़ डराने के लिए नहीं होती।
 कुछ आवाज़ें इसलिए भी होती हैं कि हम महफ़ूज़ सो सकें।

और शायद मेरे भीतर की वह छोटी-सी बच्ची आज भी उसी उत्तर की प्रतीक्षा में है.. कि अगली बार जब कहीं से “जागते रहो” की आवाज़ सुनाई दे, तो वह डरकर किसी की गोद में छिपेगी.. या मुस्कुराकर कहेगी…

“हाँ, जाग रही हूँ… अब मुझे डर नहीं लगता।”

शालिनी साहित्य सृजन… ✍️